वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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प्रीतिका आनन्द सदा नहीं मिल सकता। मान लो, स्त्री पतिव्रता भी हो, तो सम्भव है कि, वह पहले ही मर जाय। इस तरह भी वियोग हो सकता है।
सारगंश यह कि, आयु, यौवन, धन और नारी—ये सभी चंचल, अनित्य और क्षणभंगुर हैं। इसीलिये परिणाममें दुःखोंके भाण्डार हैं। अतएव बुद्धिमानोंको चाहिये, कि ब्रह्ममें चित्त लगायें, रात दिन उसीका ध्यान—उसीका चिन्तना करें। उससे वे भवसागरके पार हो जायेंगे। उन्हें बारम्बार जन्म-मरणका कष्ट न होगा—नित्य स्थायो सुख मिलेगा। स्त्री-पुत्र, धन प्रभृतिमें मन लगानेसे सदा दुःख-सागरमें गते लगाने पड़ते हैं। मर कर फिर जन्म लेना पड़ता है और फिर मरना पड़ता है। अब बुद्धिमान ही विचार करें, कि दोनोंमें कौनसा मार्ग सुखदायी है।
कृप्य ।
जलकी तरल तरंग जात, ज्यों जात आयु यह ।
यौवन हूँ दिन चार, चटककी चोंप चाह चह ॥
ज्यों दार्मिनी प्रकाश, भोग सब जानहु तैसे ।
तैसे ही यह देह अथिर, थिर हूँ है कैसे ॥
सुनि एरे मेरे चित्त तू, होहि ब्रह्ममें लीन गति ।
संसार अपार समुद्र तर, करि नौका निज ज्ञान रति ॥८२॥
82. Life is transient like the water-currents, youth is short-lived, riches are foundationless like the flights of the human