भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( २७२ )

हे प्रिये ! जो नराधम इस लोकमें रामकी भक्तिसे विमुक्त हैं, उनके जप, तप, दया, शौच, शास्त्रोंका पठन-पाठन—ये सब वृथा हैं। असल तत्व भगवान्की निष्काम भक्ति या ब्रह्ममें लीन होना है ।

छप्पय ।

श्रुति अरु स्मृति, पुरान पढ़े विस्तार सहित जिन । साधे सब युष्कर्म, स्वर्गको बात लखौं तिन ॥ करत तहाँ हूँ चाल, कालको ख्याल भयंकर । बसा और सुरेश, सबनको जन्म मरण डर । ये बगिचबूति देखी सकल, अन्त नहीं कहु कामकी ।

अद्वैत बसको ज्ञान, यह एक ठौर चाराम की ॥८१॥

81. What is the use of reading the Vedas, the Smritis, the Purans and the voluminous Shastras or of practising the various Karamkanda actions which are fruitful only in procuring an abode in a cottage in Swarga? All other pursuits are mercenary save that of trying to enter the citadel of self-realisation which is like the Pralaya fire in putting an end to the misery of the bondages of this world.

श्रुति=वेद । स्मृति=धर्म शास्त्र; मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति वगैर । पुरान=पुराण, पुरातन इतिहास ; जिसमें प्राचीन इतिहासके भिषसे धर्मके तत्व निरूपण किये गये हों । भागवत, विष्णु पुराण और शिव पुराण आदि । डरेश=इन्द्र । अद्वैत=द्वैत रहित, एक, भेद रहित, जिसके समान दूसरा नहीं । शंकराचार्यका मत अद्वैत है ; उन्होंने जीव और ईश्वरको एक माना है ।

( २७३ )

आयुः कलोलोलं कतिपयदिवसस्थायिनी यौवन श्री-

रथाः संकल्पकल्पा घनसमयतद्विद्विभ्रा भोगपूराः ॥

कण्ठारलेषोपगृहं तद्विपि च न चिरं यत्पियामिः प्रणीतं

ब्रह्मण्यासक्तचित्ता भवत भवभयाम्मोधिपारं तरीतुम् ॥८२॥

आयु—उग्र—पानीकी लहरोंके समान चञ्चल है, जवानी थोड़े दिनोंकी है, घन मनके संकल्पोंसे भी कम देर ठहरनेवाला है भोग वर्षाकालमें चमकनेवाली बिजलीकी चमकसे भी अधिक चञ्चल है, प्यारी स्त्रीका गलेसे लगाना भी चिरस्थायी नहीं है। इस लिए मनुष्यो ! भवसागरसे पार होनेके लिए ब्रह्ममें लीन होओ ॥८२॥

आयु की चंचलता ।

✠ ✠ ✠

प्राणीकी आयुका कोई ठिकाना नहीं। यह जलकी तरङ्गोंके समान चञ्चल और पानीके बुलबुलेके समान क्षणस्थायी है। यह अभी है और अगले क्षण न रहे। जो साँस बाहर जाता है, वह वापस आवे और न आवे। इधर प्राणी जन्म लेता है और उधर मौत उसके पीछे लगती है। ऐसे क्षणभंगुर जीवनपर क्या खुशी मनायी जाय ? “मोहमुद्गर” में कहा है—

नलिनीदलगतजलमतितरलं, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।

१८

( २७४ )

विदि व्याधिग्यालयस्तं, लोकं शोकहतन्व समस्तम् ॥

पश्चपत्र पर पड़ा हुआ जल अतीव चञ्चल होता है, मनुष्य का जीवन भी उसी तरह अतीव चञ्चल है। यह सारा संसार रोग-रूपी सर्पासे श्रलित हो रहा है। इसमें दुःख-ही-दुःख है।

जवानी ।

—○—

जिस तरह मनुष्यकी आयु पानीकी लहरोंके समान चञ्चल और सदा-सर्वदा रहने वाली नहीं है; उसी तरह जवानी भी चन्द्रोत्क्रा या अल्पकालस्थायी है। सदा कोई जवान नहीं रहा। अवस्थायें बदलती ही रहती हैं। बचपन के बाद जवानी और जवानीके बाद बुढ़ाप्रा आता है और अवश्य आता है। चार दिनोंको चाँदनों, फेर अँधेरी रात वाली बात है। किसीने कहा है:—

सदा न फूलै तोरईं, सदा न सावन होय ।

सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवे कोय ॥

सदा तोरईं नहीं फूलती, सदा सावन नहीं रहता, सदा जवानी नहीं रहती और सदा कोई जीता भी नहीं रहता। और भी कहा है:—

( २७५ )

रहती है कब, व्हारे जवानी तभाम उग्र, मानिन्द वूये गुल, इधर आई उधर गई ।

यौवन अवस्था को बहार उग्र-भर थोड़े ही रहती है। यह तो फूलकी सुगन्धकी तरह इधर आई, उधर गई।

जो आज जवानीके नशेमँ मतवाले हो रहे हैं, जो मल-मल कर और साबुन लगा-लगा कर अपनी मिट्टीकी कायाको धोते और उसे चन्दन कपूर एवं इत्र-फुलेलॉसे सुगन्धित करते एवं भाँति-भाँतिके गहने पहने रहते हैं, स्त्रियाँ जो अपनी दोनों छातियोंको ऊँची उठा कर चलती हैं और पुरुष जो मूछोंपर बल और तांच देते हैं, वे होश करे और मनमँ निश्चय समझले कि, उनका यह शरीर सदा उनके साथ न रहेगा, एक दिन यहाँ-का-यहाँ ही बड़ा रह जायगा और मिट्टीमें मिल जायगा। कायाके नाश होनेके पहले ही बुढ़ावस्था युवावस्थाको निगल जायगी। जो दाँत आज मोंतियों की तरह चमकते हैं, वे कल हिल-हिल कर आपका दम नाक में कर देंगे और एक-एक करके आपका साथ छोड़ देंगे। उस समय आपका मुख पोपठा और भड़ा हो जायगा। जिन बालों को आप रोज धोते और साफ रखते हैं तथा जिनकी सजावट आप तरह-तरहसे करते हैं, वे एक दिन सफेद या सनकी तरह हो जायेंगे। ये फूले हुए गाल पिचक जायेंगे। आँखों में यह रसोलापन न रहेगा। इनमें पीलापन और पुम्ब छा जायगा। आज की सी अकड़-तकड़ न रहेगी, छाड़ीके

( २७६ )

सहारे चलोगे और वह भी काँपने लगेगी । जो लोग आज आपको देखकर खुश होते हैं, आपका आदर करते हैं, वे ही आपका अनादर करेंगे, आपकी बात भी न पूछेंगे, यह तो आप की काया और जवानीका हाल है, अब अपने धन-दोलत की चञ्चलताकी बातें भी सुनिये ।

लक्ष्मी चञ्चल है ।

—oo—oo—oo—

लक्ष्मीको चञ्चला और चपला भी कहते हैं । लक्ष्मी ठीक उस चपला की तरह है, क्षणमें चमकती और क्षण भरमें ही बादलोंमें बिलाय जाती है । अनेकोंने इस धनको मनके विचारोंकी तरह क्षणस्थायी और बेजड़ कहा है । यह धन किसीके पास सदा नहीं रहा । तीन पीढ़ीसे अधिक तो एक परिवारमें धन रहते किसी ने देखा ही नहीं । आज जो धनी है, कल वही निर्धन हो जाता है । आज जो हज़ारों को भोजन देता है, कल वही अपने भोजनके लिये औरोंके द्वारपर भटकता फिरता है । आज जो राजा है, कल वही रंक हो जाता है । आज जो बिना मोटर और जोड़ीके एक कदम चल नहीं सकता, कल वही पैदल दौड़ा फिरता है । आज जिसकी आज़ा-पालनके लिये हज़ारों दास-दासी खड़े रहते हैं, कल वही दूसरोंकी आज़ा पालनके लिये खड़ा देखा जाता है । सारांश यह कि, धन-वैभव न तो सदा

( २७७ )

किसीके पास रहा हो और न आगे ही रहेगा। इसोलिये धन को भी चञ्चल कहा है। नीतिमें लिखा है:—

यौवनं जीवितं चित्तं द्वायालक्ष्मीश्च स्वामिता ।

चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥

यौवन, जीवन, मन, शरीरकी छाया, धन और स्वामिता—ये छहों चञ्चल हैं, यानी स्थिर होकर नहीं रहते।

मूर्ख हैं वे, जो इस कूड़े और सदा न रहनेवाले धन पर फूँकते और घमण्ड करते हैं। वे समझते हैं कि, यह हमारे पास सदा रहेगा; पर यह उनकी भारी भूल है। धनको सदा बिजलीकी चमक और बादलकी छायाकी तरह क्षणस्थायी और चंचल समझ कर असिमान न करना चाहिये। “मोहमुद्गर” में कहा है:—

मा कुरु धनजन यौवन गर्वं

हरति निमेषात् कालः सर्वं,

मायामयमिदमखिलं हित्वा,

ब्रह्मपदं प्रविशाशु विदित्वा ॥

इस धन-यौवनका गर्व न कर, काल इसको पटक मारते हुए लेता है। इस मायामय झंसारको त्यागकर, शोघ ही ब्रह्मपद में प्रविष्ट हो।

( २७८ )

स्त्रीका आर्लिंगन भी चिरस्थायी नहीं है।

जिस तरह आयु, यौवन और धन चंचल है ; उसी तरह नारी भी चंचल है। आज जो अपनी है, उसे कल परायी होते देर नहीं लगती। आज जो रमणियोंके साथ आनन्द करते हैं, कल वे ही उनके बियोगमें तड़पते देखे जाते हैं। कहते हैं कि स्त्री करवट बदलते पराई हो जाती है। कहा है—

शास्त्रं सुचिन्तितमथो परिचिन्तनीयम् ।

आराधितोऽपि नृपतिः परिशंकनीयः ।

अंकेश्चिन्तयिष्यते युवतिः परिरक्षणीयः ।

शास्त्रे नृपे च युवतो च कुतो वशित्वम् ?

बूब याद किये हुए शास्त्रको भी बार-बार फेरना चाहिये, बूब सेवा किये हुए राजासे भी डरना चाहिये, गोदमें पड़ी स्त्रीकी सावधानीसे रक्षा करनी चाहिये ; क्योंकि शास्त्र, राजा और युवती इनका विश्वास नहीं।

“क्षीणां विश्वासे नैव कर्तव्यः”

स्त्रियोंका विश्वास नहीं करना चाहिये, ऐसे-ऐसे वाक्य जगह-जगह मिलते हैं। महाराजा भर्तृहरि को ही लीजिये। महाराजामें क्या बुद्धि थी ? क्या उनमें बलवीर्य, रूप, विद्या चातुरी प्रभृति किसी भी गुणकी कमी थी ? क्या उनके यहाँ

( २७६ )

सुख-भोगके सामानों की कमी थी ? नहीं, कुछ भी नहीं । सब कुछ था ; पर पिंगला ने महाराजाको छोड़, घोड़ोंके दारोगासे दिल लगाया । फिर ; स्त्रियोंकी प्रीतिको सदा रहने वाली कैसे कह सकते हैं ?

एक स्त्रीकी दूगावाजी ।

—oooo—

एक साहूकारने अपने लड़केको नाराज़ होकर घरसे निकाल दिया । चलते समय उसने अपनी स्त्रीसे कहा—“तुझे मैं तेरे पीहर पहुँचाता जाऊँ, क्योंकि वनमें बड़े कष्ट हैं और अभी रोज़गारका ठिकाना नहीं । ईश्वर जाने क्या-क्या कष्ट उठाने होंगे ।” स्त्रीने कहा—“स्वामिन् मैं आपके बिना क्षणभर भी नहीं रह सकती । आपके बियोगके मुक्तावलेमें राह-बाट और वनके कष्ट तुच्छ हैं । मैं आपके साथ चलूँगी और आपकी पदसेवा कर अपने तई धन्य समझूँगी ।” साहूकारके लड़केके बहुत समझाने पर भी जब स्त्री न मानी, तो उसने उसे अपने साथ ले लिया ।

वे दोनों स्त्री-पुरुष घरसे कुछ दूर लेकर चल दिये । रोज़ मंजिलोंपर मंजिले तय करते हुए, एक दिन दोनों, दोपहरके समय, एक फ़कीरके तकिचे पर पहुँचे । वहाँ वृक्षोंकी सघन छाया थी, सामने ही भोड़े फासिलेपर एक कुआँ था । साहूकारका लड़का लोटा डोर ले जल लाने गया और स्त्री

( २८० )

वहीं बैठो रही । फ़कीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है; अतः उससे कहा—“तु मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूपमें धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़कीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । उ्यों ही उसका पति खोटा : खींचनेको भुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़कीरके साथ होली । फ़कीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे यौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी ताळीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।

उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालब थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने उ्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तु कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । झापाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।

( २८१ )

बनजारने उसकी चिकित्सा कराकर उसे गरम कपड़ोंमें सुला दिया। चन्द्रोज्ञमें वह बनजारा भी उसी नगरमें पहुँचा। साहूकारका लड़का रोज़गारकी तलाशमें घूमता रहा। ईश्वर-कृपासे एक बड़े सेठने उसे अपने यहाँ रख लिया। लड़का बड़ा ही वलता-पुरज़ा निकला, इसलिये उस सेठने उसे अपना प्रधान मुनीम बना लिया।

उन्हीं दिनों उस वेश्याकी बड़ी तारीफ़ सुन, राजाने अपने यहाँ उसके नाचका हुक्म दिया। महफ़िल सज़ाई गई, चारों ओर नगरके सेठ-साहूकार, रईस-अमीर बैठे। राजा सिंहासनपर बैठा। वेश्या नाचने लगी। उसके रूप और नाच-गान पर महफ़िलकी महफ़िल मुग्ध हो गई। इतनेमें उस वेश्याकी नज़र उस साहूकारके लड़के या अपने पतिपर पड़ गई। राजाने प्रसन्न होकर कहा, “बोबो! तुम माँगो, वही इनाम मिलेगा।” वेश्याने कहा—“महाराज! यदि आप मुझे इनाम देनेका बचन देते हैं, तो यह बचन दीजिये, कि मैं जो माँगूँ वही मिले।” जब राजा बचन-बद्ध हो गया था, तब वेश्याने कहा—राजन्! वह सामने बैठा हुआ पुरुष मेरा चोर है, उसे मरवा दीजिये।” जब राजाने उसके मारे जानेकी आज्ञा दे दी, तब साहूकारके लड़केने कहा—“इसके पास मेरी कुछ धरोहर है; इससे कहिये कि, यह हाथमें जल ले मुझे उसे कल्प कर के दे दे।” वेश्याने कहा—“मुप! तेरा मुझे क्या देना है? खौर, ले; मैं जल लेकर संकल्प करके कहती हूँ, कि जो कुछ

( २८० )

वहीं बैठो रही । फ़क़ीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है ; अतः उससे कहा—“तू मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूप़में धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़क़ीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । ज्यों ही उसका पति छोटा ; खींचनेको झुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़क़ीरके साथ होली । फ़क़ीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे मौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी तालीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था ; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।

उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालध थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने ज्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तू कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । क़पाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।

( २८१ )

बनजारने उसकी चिकित्सा कराकर उसे गरम कपड़ोंमें सुटा दिया। चन्द्रगुप्तमें वह बनजारा भी उसी नगरमें पहुँचा। साहूकारका लड़का रोजगारकी तलाशमें घूमता रहा। ईश्वर-कृपासे एक बड़े सेठने उसे अपने यहाँ रख लिया। लड़का बड़ा ही वलता-पुरज़ा निकला, इसलिये उस सेठने उसे अपना प्रधान मुनीम बना लिया।

उन्हीं दिनों उस वेश्याकी बड़ी तारीफ सुन, राजाने अपने यहाँ उसके नाचका हुकम दिया। महफिल सज़ाई गई, चारों ओर नगरके सेठ-साहूकार, रईस-अमीर बैठे। राजा सिंहासनपर बैठा। वेश्या नाचने लगी। उसके रूप और नाच-गान पर महफिलकी महफिल मुग्ध हो गई। इतनेमें उस वेश्याकी नज़र उस साहूकारके लड़के या अपने पतिपर पड़ गई। राजाने प्रसन्न होकर कहा, “बोबो! तुम माँगो, वही इनाम मिलेगा।” वेश्याने कहा—“प्रहाराज! यदि आप मुझे इनाम देनेका बचन देते हैं, तो यह बचन स्वीजिये, कि मैं जो माँगूँ वही मिले।” जब राजा बचन-बद्ध हो गया था, तब वेश्याने कहा—राजन्! वह सामने बैठा हुआ पुरुष मेरा चोर है, उसे मरवा स्वीजिये।” जब राजाने उसके मारे जानेकी आज्ञा दे दी, तब साहूकारके लड़केने कहा—“इसके पास मेरी कुछ धरोहर है; इससे कहिये कि, यह हाथमें जल ले मुझे उसे कल्प कर के दे दे।” वेश्याने कहा—“मुए! तेरा मुझे क्या देना है? खौर, ले; मैं जल लेकर संकल्प करके कहती हूँ, कि जो कुछ

( २८२ )

तेरा मेरे पास हो तू ले।" वेश्याके संकल्प छोड़ते ही वह ज़मीनपर गिर पड़ी और मर गई। राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उसने उस लड़केसे इस घटनाका असली तत्व पूछा। लड़केने कहा—"राजन् ! यह मेरी न्याहता स्त्री है। मैं और यह घरसे निकल आये। राहमें इसे साँपने काटा, और यह मर गई, मैं भी इसीके साथ जलनेको तैयार हुआ। इतनेमें महादेव-पार्वती उधर आ निकले। पहले तो उन्होंने कहा—"अरे पागल ! स्त्रीके लिये जान देता है ! तू है तो और बहुत स्त्रियाँ मिल जायेंगी। पर मैं उनकी बातपर राजी न हुआ, तब उन्होंने कहा—"तू हाथमें जल लेकर अपनी आधी आयु इसे दे, तो यह जी सकती है। फिर भी, जब कभी तू अपनी शेष बची आयु इससे माँगोगा और यह संकल्प छोड़ देगी, तब यह मर जायगी। महाराजा मुझे यह प्राणांसे भी प्यारी थी ; अतः मैंने अपनी आधी आयु इसे देदी। इसके बाद यह मुझे कूपमें धकेल फ़कीरके साथ बड़ी आई और वेश्या हो गई। आज यह मुझे जानसे मरवाने पर ही तुल गई। स्त्री-जातिकी प्रीतिका ज़रा भी विश्वास नहीं।" राजा उससे बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना प्रधान मन्त्री बना लिया।

इस कहानीसे हमने स्त्रियोंकी प्रीतिका नमूना दिखाया है। निश्चय ही सभी स्त्रियाँ ऐसी नहीं होतीं ; पर इसमें शक नहीं कि, अधिकांश ऐसी ही होती हैं ; अतः स्त्री की

( २८३ )

प्रीतिका आनन्द सदा नहीं मिल सकता। मान लो, स्त्री पतिव्रता भी हो, तो सम्भव है कि, वह पहले ही मर जाय।

इस तरह भी वियोग हो सकता है।

सारगंश यह कि, आयु, यौवन, धन और नारी—ये सभी चंचल, अनित्य और क्षणभंगुर हैं। इसीलिये परिणाममें दुःखोंके भाण्डार हैं। अतएव बुद्धिमानोंको चाहिये, कि ब्रह्ममें चित्त लगायें, रात दिन उसीका ध्यान—उसीका चिन्तना करें। उससे वे भवसागरके पार हो जायेंगे। उन्हें बारम्बार जन्म-मरणका कष्ट न होगा—नित्य श्वायो सुख मिलेगा। स्त्री-पुत्र, धन प्रभृतिमें मन लगानेसे सदा दुःख-सागरमें गोते लगाने पड़ते हैं। मर कर फिर जन्म लेना पड़ता है और फिर मरना पड़ता है। अब बुद्धिमान ही विचार करें, कि दोनोंमें कौनसा मार्ग सुखदायी है।

कृपय ।

जलकी तरल तरंग जात, ज्यों जात आयु यह ।

यौवन हूँ दिन चार, चटककी चोंप चाह चह ॥

ज्यों दामिनी प्रकाश, भोग सब जानहु तैसे ।

तैसे ही यह देह अथिर, थिर हवै है कैसे ॥

सुनि एरे मेरे चित्त तू, होहि ब्रह्ममें लीन गति ।

संसार अधार समुद्र तर, करि नौका निज ज्ञान रति ॥ ८२ ॥

82. Life is transient like the water-currents, youth is short-lived, riches are foundationless like the flights of the human

( २८२ )

तेरा मेरे पास हो तु ले।" वेश्याके संकल्प छोड़ते ही वह ज़मीनपर गिर पड़ी और मर गई। राजाको बड़ा विस्मय हुआ। उसने उस लड़केसे इस घटनाका असली तत्व पूछा। लड़केने कहा—"राजन्! यह मेरी न्याहता स्त्री है। मैं और यह घरसे निकल आये। राहमें इसे साँपने काटा, और यह मर गई, मैं भी इसीके साथ जलनेको तैयार हुआ। इतनेमें महादेव-पार्वती उधर आ निकले। पहले तो उन्होंने कहा—"अरे पागल! स्त्रीके लिये जान देता है! तू है तो और बहुत स्त्रियाँ मिल जायेंगी। पर मैं उनकी बातपर राजी न हुआ, तब उन्होंने कहा—"तू हाथमें जल लेकर अपनी आधी आयु इसे दे, तो यह जी सकती है। फिर भी, जब कभी तू अपनी शेष बची आयु इससे माँगैगा और यह संकल्प छोड़ देगी, तब यह मर जायगी। महाराजा मुझे यह प्राणोंसे भी प्यारी थी; अतः मैंने अपनी आधी आयु इसे देदी। इसके बाद यह मुझे कूपमें धकेल फ़कीरके साथ चली आई और वेश्या हो गई। आज यह मुझे जानसे मरवाने पर ही तुल गई। स्त्री-जातिकी प्रीतिका ज़रा भी विश्वास नहीं।" राजा उससे बहुत प्रसन्न हुआ और उसे अपना प्रधान मन्त्री बना लिया।

इस कहानीसे हमने स्त्रियोंकी प्रीतिका नमूना दिखाया है। निश्चय ही सभी स्त्रियाँ ऐसी नहीं होतीं; पर इसमें शक नहीं कि, अधिकांश ऐसी ही होतीं हैं; अतः स्त्री की

( २८३ )

प्रीतिका आनन्द सदा नहीं मिल सकता। मान लो, स्त्री पतिव्रता भी हो, तो सम्भव है कि, वह पहले ही मर जाय। इस तरह भी वियोग हो सकता है।

सारगंश यह कि, आयु, यौवन, धन और नारी—ये सभी चंचल, अनित्य और क्षणभंगुर हैं। इसीलिये परिणाममें दुःखोंके भाण्डार हैं। अतएव बुद्धिमानोंको चाहिये, कि ब्रह्ममें चित्त लगायें, रात दिन उसीका ध्यान—उसीका चिन्तना करें। उससे वे भवसागरके पार हो जायेंगे। उन्हें बारम्बार जन्म-मरणका कष्ट न होगा—नित्य स्थायो सुख मिलेगा। स्त्री-पुत्र, धन प्रभृतिमें मन लगानेसे सदा दुःख-सागरमें गते लगाने पड़ते हैं। मर कर फिर जन्म लेना पड़ता है और फिर मरना पड़ता है। अब बुद्धिमान ही विचार करें, कि दोनोंमें कौनसा मार्ग सुखदायी है।

कृप्य ।

जलकी तरल तरंग जात, ज्यों जात आयु यह ।

यौवन हूँ दिन चार, चटककी चोंप चाह चह ॥

ज्यों दार्मिनी प्रकाश, भोग सब जानहु तैसे ।

तैसे ही यह देह अथिर, थिर हूँ है कैसे ॥

सुनि एरे मेरे चित्त तू, होहि ब्रह्ममें लीन गति ।

संसार अपार समुद्र तर, करि नौका निज ज्ञान रति ॥८२॥

82. Life is transient like the water-currents, youth is short-lived, riches are foundationless like the flights of the human

( २८४ )

mind, the objects of pleasure are transitory like the flashes of lightning in the rainy season and the embracing of beloved women also does not last for a long time. O men, it is better for you to fix your heart on Brahma in order to swim across the ocean of worldly fears.

ब्रह्मण्डमण्डलीमात्रं किं लोभाय मनस्विनः ।

शकरीस्फुरितेनात्रैः क्षुब्धता जातु जायते ॥२३॥

जो विचारवान् है, जो ब्रह्मज्ञानी है, उसे संसार लुभा नहीं सकता। मछलीके उछलनेसे समुद्र नहीं उमड़ता ॥२३॥

जिस तरह सफरी मछलीके उछल-कूद मवानेसे समुद्र अपनी गम्भीरता को नहीं छोड़ता, ज़रा भी नहीं उमगता, जैसा का तैसा बना रहता है; उसी तरह विचारवान् ब्रह्मज्ञानी संसारी-पदार्थोंपर लट्ठू नहीं होता वह समुद्रकी तरह गम्भीर ही बना रहता है; अपनी गम्भीरता नहीं छोड़ता। समुद्र जिस तरह मछलीकी उछल-कूदको कुछ नहीं समझता, उसी तरह वह त्रिलोककी की सुख-सम्पत्ति को तुच्छ समझता है। मतलब यह है, कि संसारी विषय-भोग उन्हीं को लुभाते हैं, जो विचारवान् नहीं हैं, जिनमें विचार-शक्ति नहीं है, जिन्हें ब्रह्मज्ञानका आनन्द नहीं मालूम है। उस्ताद ज़ौक कहते हैं:—

दुनिया है वह सग्याद् कि सब दाम में इसके । आ जाते हैं लेकिन कोई दाना नहीं आता ॥

( २८५ )

दुनिया एक ऐसा जाल है, जिसमें प्रायः सभी फँसे हुए हैं। कोई दाना अर्थात् विचारशील पुरुष ही इस जालसे बचा हुआ है।

संसार अन्तः सार-शून्य है, इसमें कुछ नहीं है। यह ठोक आँचलेके समान है, जो ऊपरसे धूल सुन्दर और चिकना-चुपड़ा दोखाता है ; मगर भीतर कुछ नहीं। किसीने संसारको स्वप्नवत् और किसीने इसे कोरा ख़याल ही कहा है ! महा कवि गालिब कहते हैं:—

हस्तीके मत फेरवमें आजाइयो असद ।

आलम तमाम हलक़ ये दामे ख़याल है ॥

गालिब, सृष्टिके चक्रमें मत आ जाना। यह सब प्रपंच तुम्हारे ख़यालके सिवा और कोई चीज़ नहीं है।

इसके जालमें समझदार नहीं फँसते किन्तु नासमझ लोग, जालके किनारोंपर लगी सीपियोंकी चमक-दमक देख कर जालमें आ फँसनेवाली मछलियोंकी तरह, इसके माया-मोहमें फँस कर अनेक प्रकारके कष्ट उठाते हैं ; किन्तु ज्ञानी इसकी अनित्यता, इसकी असारता को देखकर इससे किनारा कर लेते हैं।

दोहा ।

ज्यों सफ़रीको फिरत लख, सागर करत न चोम ।

अगडासे बहागडको, त्यों सन्तनको लोम ॥५३॥

( २८६ )

83 What value has the whole world in the eyes of a man wise in the knowledge of self that he may be tempted by it ! The great Ocean is never disturbed by the jumping of a fish !

यदासीद्विज्ञानं स्मरतिभिरसंस्कारजनितं

तदा दृष्टं नारीभ्यभिदृश्येभ्यं जगदपि ॥

इदानीमस्माकं पट्टरविवेकाञ्जनसुषां

समीभूता दृष्टिस्त्रियसुवनमपि ब्रह्म तद्यते ॥८४॥

जब तक हममें कामदेव से पैदा हुआ अज्ञान-अन्धकार था, तब तक हमें सारा जगत् ब्रह्मरूप ही दीखता था। अब हमने विवेक-रूपी अञ्जन आँज लिया है, इससे हमारी दृष्टि समान हो गई है। अब हमें तीनों भुवन ब्रह्मरूप दिखाई देते हैं ॥८४॥

जब हम काम-मदसे अच्छे हो रहे थे, जब हमें अच्छे-बुरेका ज्ञान नहीं था, तब हमें स्त्री-ही-स्त्री दिखाई देती थी, बिना स्त्री हमें क्षण भर भी कल नहीं थी; किन्तु अब हममें विवेक-बुद्धि आ गई है, अब हम अच्छे-बुरेको समझने लगे हैं, इसलिये अब हमें सारा संसार एकसाँ मालूम होता है। अब हमें कहीं स्त्री नहीं दीखती, सभी तो एकसे दीखते हैं। जहाँ नज़र दोड़ाते हैं, वहीं ब्रह्म ही ब्रह्म नज़र आता है। मतलब यह, कि न कोई स्त्री है न कोई पुरुष, सभी तो एकही हैं; केवल चोलेका भेद है। आत्मा न स्त्री है न पुरुष; वह

( २८७ )

सबमें समान है। मगर अज्ञानियोंको यह बात नहीं दीखती। उन्हें और का और दीखता है।

श्वेताश्वतरोपनिषद्में लिखा है :—

नैव स्त्री न पुमानेष न चैवायं नपुंसकः।

यवच्छरीरमादत्ते तेन तेन स युज्यते ॥

यह आत्मा न स्त्री है न पुरुष और न नपुंसक। यह जिस जिस शरीरको धारण करता है, उसी-उसीके साथ जुड़ जाता है।

जब मनुष्यको इस बातका ज्ञान हो जाता है कि, स्त्री और पुरुषमें कोई भेद नहीं, जो मैं हूँ वही स्त्री है—स्त्रीने और तरहका कपड़ा पहन रक्खा है और मैंने और तरहका—तब उसका मन स्त्री पर नहीं भूलता। अपने ही स्वरूपको और समझ कर उससे मैथुन करनेकी इच्छा नहीं होती। ज्ञानी को संसारमें शत्रु, मित्र, स्त्री-पुत्र, स्वामी-सेवक नहीं दीखते। वह स्त्री-पुत्र और शत्रु-मित्र सबको समान समझता है; किसीसे राग और किसीसे द्वेष नहीं रखता। उसे कुत्तेमें आदमीमें, तथा प्राणी मात्रमें ही एक विष्णु दीखता है। यह अवस्था परमपदकी अवस्था है। स्वामी शंकराचार्यायजी कहते हैं :—

शत्रौ मिले पुत्रे वन्धौ ।०

मा कुर यत्नं विग्रहसनन्धौ।