भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 366

( २६३ )

महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं :—

कोउक जात प्रयाग बनारस ।

कोउ गया जगन्नाथहि धावै ॥

कोउ मथुरा बदरी हरिद्वार सु ।

कोउ गंगा कुरुक्षेत्र नहावै ॥

कोउक पुष्कर हवै पैँच तीरथ ।

दौरिहि दौरि जु द्वारिका आवै ॥

सुन्दर चित्त गहौ घरसौंहि सु ।

बाहिर दूँदत कँकुरि पावै ? ॥

जिस तरह आँखोंमें पुतली है, उसी तरह घट में ( हृदय-कमलमें ) पैदा करने वाला है ; पर मूर्ख इस बात को नहीं जानता और उसे बाहर खोजने जाता है ।

कस्तूरी हिरन की अपनी नाभिमें है, पर भुग उसे बन में खोजता है ; उसी तरह ब्रह्म घट-घट में है, पर दुनिया इस भेद को नहीं जानती ।

अगर समझता है तो घर में रह और पलकोंका पर्दा लगा कर देख, तेरा मालिक तेरे ही अन्दर है ; अन्यत्र जानेकी जरूरत नहीं ।

कोई परमेश्वर की खोजमें प्रयाग, काशी, गया, पुरी, मथुरा, कुरुक्षेत्र और पुष्कर जाता है और कोई द्वारका जाता है । सुन्दरदासजी कहते हैं, जो धन घर में गड़ा है, वह बाहर कैसे मिलेगा ?