वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
( २६३ )
महात्मा सुन्दरदास जी कहते हैं :—
कोउक जात प्रयाग बनारस ।
कोउ गया जगन्नाथहि धावै ॥
कोउ मथुरा बदरी हरिद्वार सु ।
कोउ गंगा कुरुक्षेत्र नहावै ॥
कोउक पुष्कर हवै पैँच तीरथ ।
दौरिहि दौरि जु द्वारिका आवै ॥
सुन्दर चित्त गहौ घरसौंहि सु ।
बाहिर दूँदत कँकुरि पावै ? ॥
जिस तरह आँखोंमें पुतली है, उसी तरह घट में ( हृदय-कमलमें ) पैदा करने वाला है ; पर मूर्ख इस बात को नहीं जानता और उसे बाहर खोजने जाता है ।
कस्तूरी हिरन की अपनी नाभिमें है, पर भुग उसे बन में खोजता है ; उसी तरह ब्रह्म घट-घट में है, पर दुनिया इस भेद को नहीं जानती ।
अगर समझता है तो घर में रह और पलकोंका पर्दा लगा कर देख, तेरा मालिक तेरे ही अन्दर है ; अन्यत्र जानेकी जरूरत नहीं ।
कोई परमेश्वर की खोजमें प्रयाग, काशी, गया, पुरी, मथुरा, कुरुक्षेत्र और पुष्कर जाता है और कोई द्वारका जाता है । सुन्दरदासजी कहते हैं, जो धन घर में गड़ा है, वह बाहर कैसे मिलेगा ?
( २६४ )
सारांश यह है, कि संसार अज्ञानान्धकारके कारण “छोरा बगल में ढंढोरा शहरमें” वाली कहावत चरितार्थ करता है। ईश्वर इसी शरीर के भीतर हृदय-कमल में मौजूद है, पर अज्ञानी लोग उसे पाने के लिए तीर्थोंमें भटकते फिरते हैं। इस तरह वह मिलता भी नहीं और बुधा हैरानी होती है। जो उसके दर्शन करना चाहें, वे नेत्र बन्द करके अपने हृदयमें ही उसे देखें।
कुण्डलिया ।
फाँघौं तें आकाश को, पठयौं तें पाताल । दशों दिशामें तू फिर्यो, ऐसी चञ्चल चाल ॥ ऐसी चञ्चल चाल, इतें कबहूँ नहीं आयौं । बुद्धि सदनको पाय, पाय छिनहूँ न लुबायौं ॥ देख्यौं नहीं निजरूप, कूप अमृतको छाँघौं । एरे मन मतिमुद् ! क्यों न भव-वारिधि फेंघौं ? ॥७७॥
77. O mind, thou, enterest into the lower world, soarest even higher than the heavens and wanderest all through the infinite space, never through mistake dost thou think of the pure BRAHMA, who rests within thy own self and who will bring thee salvation from all sins.
रात्रिः सेव पुनः स एव दिवसो भत्वा बुधा जनन्तवो भानन्त्युद्यमिन्स्तथैव निभृतभारभ्यतत्क्रियाः ॥
( २६५ )
व्यापारैः पुनरुक्तमुक्तविषयैरवविनेनामुना
संसारेण कर्दर्थिताः कथमहो मोहाच्च लज्जामहे ॥७८॥
प्राथियोर्मं बुद्धिमान यद्यपि जानते हैं कि दिन और रात ठीक पहलेकी तरह ही होते हैं ; तोभी वे उन्हीं काम-धन्धेके पीछे दौड़ते हैं, जिनके पीछे वे पहले दौड़ते थे । वे लोग उन्हीं-उन्हीं कामोंमें लगे रहते हैं, जिनसे क्षणिक और बारम्बार वही लाभ होते हैं, जिनके वे बारम्बार कह और भोग चुके हैं । आश्चर्य्यका विषय है, कि मनुष्योंको लज्जा नहीं आती ! ॥७८॥
देखते हैं, कि पहले की तरह ही दिन, रात, तिथि, वार, नक्षत्र और मास तथा वर्ष आते हैं और जाते हैं ; उसी तरह हम खाते-पीते, सोते-जागते और काम-धन्धे करते हैं ; कोई नई बात नहीं देखते । जिन कामों को पहले करते थे, उन्हेंही बारम्बार करते हैं । उनमें कितना सा लाभ और सुख है, इसे भी देखते-सुनते और समझते हैं । फिर भी ; आश्चर्य्य है कि, हम इस मिथ्या संसारसे मोह नहीं तोड़ते !
कुरुडलि्या ।
वेही निशि वेही दिवसः वेही तिथि वेही वार ।
वे उद्यम वेही क्रिया, वेही विषय-विकार ।
वेही विषय-विकार, सुनैत देखत अरु सूँघत ।
वेही भोजन भोग, जागि सोवत अरु ऊँघत ।
( २६६ )
महा निलज यह जीव ; भोग में भयो विदेही ।
अजहूँ पलटत नाहि, कटत गुण वे के वैही ॥७८॥
78. Even the wise among human beings, although knowing that the days and nights now present are exactly similar to those that have passed away, run busily after the same business transactions which they had engaged themselves before. It is a wonder why we are not ashamed of sticking to the same worldly enterprises, availing of petty advantages as have been already spoken and reaped the benefit by us over and over again !
मही रम्या शय्या विपुलमुपधानं सुजलता
वितानं चाकाशं व्यजनमनुकूलोऽयमनिलः ॥
स्फुरहीपरचन्द्रो विरतिवनितासंगमुदितः
सुखं शान्तः शैले मुनिरतद्व्यतिर्णु इव ॥७९॥
मुनि लोग राजा महाराजाओंकी तरह सुखसे जमीनको ही अपनी सुखदायिनी शय्या मान कर सोते हैं। उनकी भुजा ही उनका गुदगुदा तकिया है, आकाश ही उनकी चादर है, अनुकूल हवा ही उनका पंखा है, चन्द्रमा ही उनका चिराग है, विरक्ति ही उनकी स्त्री है ; अर्थात् विरक्ति-रूपी स्त्रीको लेकर, वे, उपेक्षातः सामानोंके साथ, राजाओंकी तरह सुखसे आराम करते हैं ॥७९॥
मुनि लोगोंके पास न राजाओंकी तरह महल है, न बद्धिया-बद्धिया पल्लग और मखमली गद्दे तकिये हैं, न ओढ़ने
( २६७ )
के लिये शाल-दुशाले हैं, न बिजलीके पट्टे हैं, न भाङ-फानूस या बिजलीकी रोशनी है और न भुगनयनी, मोहिनी कामिनी ही हैं ; तोभी वे ज़मीनको ही अपना पलंग, हाथको ही तकिया, शीतल हवाको ही पट्टा, चन्द्रमाको ही दीपक और संसारी विषय-भोगोंसे विरक्ति को ही अपनी स्त्री मान कर सुखसे सोते हैं। राजा-महाराजा और अमीर-उमरा बहिया-बहिया पलंग, क्रन्दहारी कालीन, मखमली गह-तकिये, बिजलीके पंखे और रोशनी तथा सुन्दरी स्त्रियोंके साथ जो मिथ्या सुख उपभोग करते हैं, उससे लाख दर्जन उत्तम और सच्चा सुख मुनि लोग ज़मीन और अपनी भुजा, अनुकूल हवा, चन्द्रमा तथा अपनी विरक्ति रूपिणी स्त्रीके साथ उपभोग करते हैं। अब बुद्धिमानोंको विचार करना चाहिये, कि उन दोनोंमें बुद्धिमान कौन है और वास्तविक सुख किसे मिलता है। अमीरोंको सुखके लिये कितने भङ्गभट करने पड़ते हैं और कितनी आफूतें उठानी पड़ती हैं ; तथापि उन्हें सच्चा सुख नहीं मिलता और मुनि लोग बिना भङ्गभट, बिना आफूत और बिना प्रयासके सच्चा सुख भोगते और शान्तिकी नींद सोते हैं।
छप्पय ।
पृथ्वी परम पुनीत, पलंग ताकी मन मान्यौ ।
तकिया अपनो हाथ, भुगनको तम्बू तान्यो ॥
पुनीत=पवित्र। भुगन=आस्मान। चन्द-चिराग=चन्द्रमा-चिराग
( २६८ )
सोहत चन्द चिराग, बीजना करत दशोंदिशि ।
बनिता अपनी वृत्ति, संगही रहत दिवस-निशि ॥
अतुल अपार सम्पत्ति सहित, सोहत है सुखमें मगन ।
मुनिराज महानुपराज ज्यों, पौड़े देखे हम हगन ॥७६॥
79. A sage sleeps in comfort and peace like a great king on the most comfortable sofa of the earth, with the soft pillow made of his own arm under his head, with the open sky above as his bed-cover, the congenial breeze serving him as a fan, the moon giving him the light of a lamp, enjoying the conjugal association of non-attachment with pleasures of life.
त्रैलोक्याधिपतित्वमेव विरसं यस्मिन्महाशासने
तल्लब्ध्वासनवस्त्रमानघटने भोगे रतिं मा कृथाः ॥
भोगः कोऽपि स एक एव परमो नित्योदितो जृम्भते
यत्त्वादाद्विरसा भवन्ति विषयास्त्रैलोक्यराज्यादयः ॥८०॥
हे आत्मा ! अगर तुम्हे उस ब्रह्मका ज्ञान होगाया है, जिसके सामने तीन लोकका राज्य तुच्छ मालूम होता है ; तो तू भोजन, वस्त्र और मानके लिए भोगोंकी चाहना मत कर ; क्योंकि वह भोग सर्वश्रेष्ठ और नित्य है ; उसके मुकाबलेमें त्रिलोकीके राज्य प्रभृति सुख कुछ भी नहीं हैं ॥८०॥
हे । बीजना = पंखा । बनिता = स्त्री । पौड़े देखे = सोते हुए देखे ।
हगन = आँखोसे ।
( २६६ )
जब तक मनुष्यको ब्रह्मज्ञान नहीं होता, जबतक उसे आत्म-ज्ञान नहीं होता, जब तक उसे उस सुखका खाद नहीं मिलता, तभी तक मनुष्य संसारी-विषय-भोगोंमें सुख समझता है। जब मनुष्यको उस सर्वोत्तम—सदा स्थिर रहनेवाले सुखका स्वाद मिल जाता है, तब वह संसारी आनन्द या दुनियाबी मज़े तो क्या—त्रिभुवनके राजसुखको भी कोई चीज़ नहीं समझता। मतलब यह है कि, सच्चा और वास्तविक सुख ब्रह्म-ज्ञान या आत्मज्ञानमें है। उसके बराबर आनन्द त्रिलोकीके और किसी भी पदार्थमें नहीं है। जो संसारी पदार्थोंमें सुख मानते हैं, वे अज्ञानी और नासमझ हैं। उनमें अच्छे और बुरे, असल और नक़लके पहचाननेकी तमीज़ नहीं। वे रस्तीको सौप और मुगमरीविकाको जल समझनेवालोंकी तरह भ्रममें डूबे या बहँके हुए हैं।
सोरठा ।
कहा विषयको भोग, परम भोग इक और है।
जाके हात संयोग, नीरस लागत इन्द्रपद ॥ ८० ॥
80. If you have realised the great One in whose presence the kingdom of the three worlds appears to give no pleasure, you should not cherish any longing for the acquirement of enjoyments such as those of good seats, clothes and honour. There is an Enjoyment somewhere, Great and Eternal, by tasting which all pleasures like that of the
( २७० )
kingdom of the three worlds become tasteless or lose fascination.
किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रैर्वाहविस्तैः
स्वर्गप्राप्तकुटीनिवासफलदैः कर्मक्रियाविश्रमैः ॥
मुक्तवैकं भवन्वन्दुःखरचनाविध्वंसकालानलं
स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषा वणिगृत्तयः ॥८१॥
वेद, स्मृति, पुराण और बड़े-बड़े शास्त्रोंके पढ़ने तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके कर्मकाण्ड करनेसे स्वर्गमें एक कुटियाकी जगह प्राप्त करनेके सिवा और क्या लाभ है ? ब्रह्मानन्दरूपी गद्दीमें प्रवेश करनेकी चेष्टाके सिवा, जो संसार-बन्धनोंके काटनेमें प्रलयाग्निके समान है, और सब काम व्यापारियोंके से काम हैं ॥८१॥
वेद, स्मृति, पुराण और बड़े-बड़े शास्त्रोंके पढ़ने-सुनने और उनके अनुसार कर्म करनेसे मनुष्यको कोई बड़ा लाभ नहीं है। अगर ये कर्मकाण्ड ठीक तरहसे पार पड़ जाते हैं, तो इनसे इतना ही होता है, कि स्वर्गमें एक कुटीके लायक स्थान मिल जाता है, पर वह स्थान भी सदा कृत्रुमें नहीं रहता ; जिस दिन पुण्यकर्मोंका ओर आ जाता है, उस दिने वह स्वर्गीय स्थान फिर छिन जाता है ; इससे प्राणीको फिर दुःख होता है। मतलब यह हुआ, कि कर्मकाण्डोंसे जो सुख मिलता है, वह सुख नित्य या सदा-सर्वदा रहने वाला
( २७१ )
नहीं; उस सुखके अन्तमें फिर दुःख होता है—फिर स्वर्ग छोड़ कर मृत्युलोकमें जन्म लेना पड़ता है—वही जन्म-मरण के दुःख झेलने पड़ते हैं। इस लिये मनुष्योंको ब्रह्मज्ञानी होनेकी चेष्टा करनी चाहिये; क्योंकि ब्रह्मज्ञान रूपी अग्नि प्रलयशक्तिके समान है। वह अग्नि संसार-बन्धनोंको जड़ से जला देती है; अतः फिर सदा सुख रहता है—दुःखका नाम भी सुननेको नहीं मिलता। इसलिये ज्ञानियोंने ब्रह्म-ज्ञान—आत्मज्ञानको सर्वोपरि सुख दिलाने वाला माना है। मतलब यह है, कि बिना ब्रह्मज्ञान या रामभक्तिके सब जप-तप आदि वृथा है। सारे वेद शास्त्रों और पुराणोंका यही निबोड़ है कि, ब्रह्म सत्य और जगत् मिथ्या है तथा जीव ब्रह्मरूप है। जो इस तत्त्वको जानता है वही सन्न्वा पण्डित है। जो ब्रह्म या आत्माको नहीं जानता, वह अज्ञानी और मूर्ख है। उसका पढ़ना-लिखना वृथा समय नष्ट करना है।
तुलसीदासजीने कहा है:—
चतुरार्द्र चूलहे परौ, यम गहि ज्ञानहि खाय ।
तुलसी प्रेम न रामपद, सब जसमूल नशाय ॥
महादेवजी पार्वतीजीसे कहते हैं:—
ये नराधम लोकेषु, रामभक्ति पराड्मुख्याः ॥
जपं तपं दयाशौचं, श्रवन्नाणां श्रवणाहनम् ॥
सर्वं वृथा चिन्ता येन, शृणुत्वं पार्वति प्रिये ! ॥
( २७२ )
हे प्रिये ! जो नराधम इस लोकमें रामकी भक्तिसे विमुक्त हैं, उनके जप, तप, दया, शौच, शास्त्रोंका पठन-पाठन—ये सब वृथा हैं। असल तत्व भगवान्की निष्काम भक्ति या ब्रह्ममें लीन होना है ।
छप्पय ।
श्रुति अरु स्मृति, पुरान पढ़े विस्तार सहित जिन । साधे सब युष्कर्म, स्वर्गको बात लखौं तिन ॥ करत तहाँ हूँ चाल, कालको ख्याल भयंकर । बसा और सुरेश, सबनको जन्म मरण डर । ये बगिचबूति देखी सकल, अन्त नहीं कहु कामकी ।
अद्वैत बसको ज्ञान, यह एक ठौर चाराम की ॥८१॥
81. What is the use of reading the Vedas, the Smritis, the Purans and the voluminous Shastras or of practising the various Karamkanda actions which are fruitful only in procuring an abode in a cottage in Swarga? All other pursuits are mercenary save that of trying to enter the citadel of self-realisation which is like the Pralaya fire in putting an end to the misery of the bondages of this world.
श्रुति=वेद । स्मृति=धर्म शास्त्र; मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति वगैर । पुरान=पुराण, पुरातन इतिहास ; जिसमें प्राचीन इतिहासके भिषसे धर्मके तत्व निरूपण किये गये हों । भागवत, विष्णु पुराण और शिव पुराण आदि । डरेश=इन्द्र । अद्वैत=द्वैत रहित, एक, भेद रहित, जिसके समान दूसरा नहीं । शंकराचार्यका मत अद्वैत है ; उन्होंने जीव और ईश्वरको एक माना है ।
( २७३ )
आयुः कलोलोलं कतिपयदिवसस्थायिनी यौवन श्री-
रथाः संकल्पकल्पा घनसमयतद्विद्विभ्रा भोगपूराः ॥
कण्ठारलेषोपगृहं तद्विपि च न चिरं यत्पियामिः प्रणीतं
ब्रह्मण्यासक्तचित्ता भवत भवभयाम्मोधिपारं तरीतुम् ॥८२॥
आयु—उग्र—पानीकी लहरोंके समान चञ्चल है, जवानी थोड़े दिनोंकी है, घन मनके संकल्पोंसे भी कम देर ठहरनेवाला है भोग वर्षाकालमें चमकनेवाली बिजलीकी चमकसे भी अधिक चञ्चल है, प्यारी स्त्रीका गलेसे लगाना भी चिरस्थायी नहीं है। इस लिए मनुष्यो ! भवसागरसे पार होनेके लिए ब्रह्ममें लीन होओ ॥८२॥
आयु की चंचलता ।
✠ ✠ ✠
प्राणीकी आयुका कोई ठिकाना नहीं। यह जलकी तरङ्गोंके समान चञ्चल और पानीके बुलबुलेके समान क्षणस्थायी है। यह अभी है और अगले क्षण न रहे। जो साँस बाहर जाता है, वह वापस आवे और न आवे। इधर प्राणी जन्म लेता है और उधर मौत उसके पीछे लगती है। ऐसे क्षणभंगुर जीवनपर क्या खुशी मनायी जाय ? “मोहमुद्गर” में कहा है—
नलिनीदलगतजलमतितरलं, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्।
१८
( २७४ )
विदि व्याधिग्यालयस्तं, लोकं शोकहतन्व समस्तम् ॥
पश्चपत्र पर पड़ा हुआ जल अतीव चञ्चल होता है, मनुष्य का जीवन भी उसी तरह अतीव चञ्चल है। यह सारा संसार रोग-रूपी सर्पासे श्रलित हो रहा है। इसमें दुःख-ही-दुःख है।
जवानी ।
—○—
जिस तरह मनुष्यकी आयु पानीकी लहरोंके समान चञ्चल और सदा-सर्वदा रहने वाली नहीं है; उसी तरह जवानी भी चन्द्रोत्क्रा या अल्पकालस्थायी है। सदा कोई जवान नहीं रहा। अवस्थायें बदलती ही रहती हैं। बचपन के बाद जवानी और जवानीके बाद बुढ़ाप्रा आता है और अवश्य आता है। चार दिनोंको चाँदनों, फेर अँधेरी रात वाली बात है। किसीने कहा है:—
सदा न फूलै तोरईं, सदा न सावन होय ।
सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवे कोय ॥
सदा तोरईं नहीं फूलती, सदा सावन नहीं रहता, सदा जवानी नहीं रहती और सदा कोई जीता भी नहीं रहता। और भी कहा है:—
( २७५ )
रहती है कब, व्हारे जवानी तभाम उग्र, मानिन्द वूये गुल, इधर आई उधर गई ।
यौवन अवस्था को बहार उग्र-भर थोड़े ही रहती है। यह तो फूलकी सुगन्धकी तरह इधर आई, उधर गई।
जो आज जवानीके नशेमँ मतवाले हो रहे हैं, जो मल-मल कर और साबुन लगा-लगा कर अपनी मिट्टीकी कायाको धोते और उसे चन्दन कपूर एवं इत्र-फुलेलॉसे सुगन्धित करते एवं भाँति-भाँतिके गहने पहने रहते हैं, स्त्रियाँ जो अपनी दोनों छातियोंको ऊँची उठा कर चलती हैं और पुरुष जो मूछोंपर बल और तांच देते हैं, वे होश करे और मनमँ निश्चय समझले कि, उनका यह शरीर सदा उनके साथ न रहेगा, एक दिन यहाँ-का-यहाँ ही बड़ा रह जायगा और मिट्टीमें मिल जायगा। कायाके नाश होनेके पहले ही बुढ़ावस्था युवावस्थाको निगल जायगी। जो दाँत आज मोंतियों की तरह चमकते हैं, वे कल हिल-हिल कर आपका दम नाक में कर देंगे और एक-एक करके आपका साथ छोड़ देंगे। उस समय आपका मुख पोपठा और भड़ा हो जायगा। जिन बालों को आप रोज धोते और साफ रखते हैं तथा जिनकी सजावट आप तरह-तरहसे करते हैं, वे एक दिन सफेद या सनकी तरह हो जायेंगे। ये फूले हुए गाल पिचक जायेंगे। आँखों में यह रसोलापन न रहेगा। इनमें पीलापन और पुम्ब छा जायगा। आज की सी अकड़-तकड़ न रहेगी, छाड़ीके
( २७६ )
सहारे चलोगे और वह भी काँपने लगेगी । जो लोग आज आपको देखकर खुश होते हैं, आपका आदर करते हैं, वे ही आपका अनादर करेंगे, आपकी बात भी न पूछेंगे, यह तो आप की काया और जवानीका हाल है, अब अपने धन-दोलत की चञ्चलताकी बातें भी सुनिये ।
लक्ष्मी चञ्चल है ।
—oo—oo—oo—
लक्ष्मीको चञ्चला और चपला भी कहते हैं । लक्ष्मी ठीक उस चपला की तरह है, क्षणमें चमकती और क्षण भरमें ही बादलोंमें बिलाय जाती है । अनेकोंने इस धनको मनके विचारोंकी तरह क्षणस्थायी और बेजड़ कहा है । यह धन किसीके पास सदा नहीं रहा । तीन पीढ़ीसे अधिक तो एक परिवारमें धन रहते किसी ने देखा ही नहीं । आज जो धनी है, कल वही निर्धन हो जाता है । आज जो हज़ारों को भोजन देता है, कल वही अपने भोजनके लिये औरोंके द्वारपर भटकता फिरता है । आज जो राजा है, कल वही रंक हो जाता है । आज जो बिना मोटर और जोड़ीके एक कदम चल नहीं सकता, कल वही पैदल दौड़ा फिरता है । आज जिसकी आज़ा-पालनके लिये हज़ारों दास-दासी खड़े रहते हैं, कल वही दूसरोंकी आज़ा पालनके लिये खड़ा देखा जाता है । सारांश यह कि, धन-वैभव न तो सदा
( २७७ )
किसीके पास रहा हो और न आगे ही रहेगा। इसोलिये धन को भी चञ्चल कहा है। नीतिमें लिखा है:—
यौवनं जीवितं चित्तं द्वायालक्ष्मीश्च स्वामिता ।
चञ्चलानि षडेतानि ज्ञात्वा धर्मरतो भवेत् ॥
यौवन, जीवन, मन, शरीरकी छाया, धन और स्वामिता—ये छहों चञ्चल हैं, यानी स्थिर होकर नहीं रहते।
मूर्ख हैं वे, जो इस कूड़े और सदा न रहनेवाले धन पर फूँकते और घमण्ड करते हैं। वे समझते हैं कि, यह हमारे पास सदा रहेगा; पर यह उनकी भारी भूल है। धनको सदा बिजलीकी चमक और बादलकी छायाकी तरह क्षणस्थायी और चंचल समझ कर असिमान न करना चाहिये। “मोहमुद्गर” में कहा है:—
मा कुरु धनजन यौवन गर्वं
हरति निमेषात् कालः सर्वं,
मायामयमिदमखिलं हित्वा,
ब्रह्मपदं प्रविशाशु विदित्वा ॥
इस धन-यौवनका गर्व न कर, काल इसको पटक मारते हुए लेता है। इस मायामय झंसारको त्यागकर, शोघ ही ब्रह्मपद में प्रविष्ट हो।
( २७८ )
स्त्रीका आर्लिंगन भी चिरस्थायी नहीं है।
जिस तरह आयु, यौवन और धन चंचल है ; उसी तरह नारी भी चंचल है। आज जो अपनी है, उसे कल परायी होते देर नहीं लगती। आज जो रमणियोंके साथ आनन्द करते हैं, कल वे ही उनके बियोगमें तड़पते देखे जाते हैं। कहते हैं कि स्त्री करवट बदलते पराई हो जाती है। कहा है—
शास्त्रं सुचिन्तितमथो परिचिन्तनीयम् ।
आराधितोऽपि नृपतिः परिशंकनीयः ।
अंकेश्चिन्तयिष्यते युवतिः परिरक्षणीयः ।
शास्त्रे नृपे च युवतो च कुतो वशित्वम् ?
बूब याद किये हुए शास्त्रको भी बार-बार फेरना चाहिये, बूब सेवा किये हुए राजासे भी डरना चाहिये, गोदमें पड़ी स्त्रीकी सावधानीसे रक्षा करनी चाहिये ; क्योंकि शास्त्र, राजा और युवती इनका विश्वास नहीं।
“क्षीणां विश्वासे नैव कर्तव्यः”
स्त्रियोंका विश्वास नहीं करना चाहिये, ऐसे-ऐसे वाक्य जगह-जगह मिलते हैं। महाराजा भर्तृहरि को ही लीजिये। महाराजामें क्या बुद्धि थी ? क्या उनमें बलवीर्य, रूप, विद्या चातुरी प्रभृति किसी भी गुणकी कमी थी ? क्या उनके यहाँ
( २७६ )
सुख-भोगके सामानों की कमी थी ? नहीं, कुछ भी नहीं । सब कुछ था ; पर पिंगला ने महाराजाको छोड़, घोड़ोंके दारोगासे दिल लगाया । फिर ; स्त्रियोंकी प्रीतिको सदा रहने वाली कैसे कह सकते हैं ?
एक स्त्रीकी दूगावाजी ।
—oooo—
एक साहूकारने अपने लड़केको नाराज़ होकर घरसे निकाल दिया । चलते समय उसने अपनी स्त्रीसे कहा—“तुझे मैं तेरे पीहर पहुँचाता जाऊँ, क्योंकि वनमें बड़े कष्ट हैं और अभी रोज़गारका ठिकाना नहीं । ईश्वर जाने क्या-क्या कष्ट उठाने होंगे ।” स्त्रीने कहा—“स्वामिन् मैं आपके बिना क्षणभर भी नहीं रह सकती । आपके बियोगके मुक्तावलेमें राह-बाट और वनके कष्ट तुच्छ हैं । मैं आपके साथ चलूँगी और आपकी पदसेवा कर अपने तई धन्य समझूँगी ।” साहूकारके लड़केके बहुत समझाने पर भी जब स्त्री न मानी, तो उसने उसे अपने साथ ले लिया ।
वे दोनों स्त्री-पुरुष घरसे कुछ दूर लेकर चल दिये । रोज़ मंजिलोंपर मंजिले तय करते हुए, एक दिन दोनों, दोपहरके समय, एक फ़कीरके तकिचे पर पहुँचे । वहाँ वृक्षोंकी सघन छाया थी, सामने ही भोड़े फासिलेपर एक कुआँ था । साहूकारका लड़का लोटा डोर ले जल लाने गया और स्त्री
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वहीं बैठो रही । फ़कीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है; अतः उससे कहा—“तु मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूपमें धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़कीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । उ्यों ही उसका पति खोटा : खींचनेको भुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़कीरके साथ होली । फ़कीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे यौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी ताळीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।
उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालब थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने उ्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तु कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । झापाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।
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बनजारने उसकी चिकित्सा कराकर उसे गरम कपड़ोंमें सुला दिया। चन्द्रोज्ञमें वह बनजारा भी उसी नगरमें पहुँचा। साहूकारका लड़का रोज़गारकी तलाशमें घूमता रहा। ईश्वर-कृपासे एक बड़े सेठने उसे अपने यहाँ रख लिया। लड़का बड़ा ही वलता-पुरज़ा निकला, इसलिये उस सेठने उसे अपना प्रधान मुनीम बना लिया।
उन्हीं दिनों उस वेश्याकी बड़ी तारीफ़ सुन, राजाने अपने यहाँ उसके नाचका हुक्म दिया। महफ़िल सज़ाई गई, चारों ओर नगरके सेठ-साहूकार, रईस-अमीर बैठे। राजा सिंहासनपर बैठा। वेश्या नाचने लगी। उसके रूप और नाच-गान पर महफ़िलकी महफ़िल मुग्ध हो गई। इतनेमें उस वेश्याकी नज़र उस साहूकारके लड़के या अपने पतिपर पड़ गई। राजाने प्रसन्न होकर कहा, “बोबो! तुम माँगो, वही इनाम मिलेगा।” वेश्याने कहा—“महाराज! यदि आप मुझे इनाम देनेका बचन देते हैं, तो यह बचन दीजिये, कि मैं जो माँगूँ वही मिले।” जब राजा बचन-बद्ध हो गया था, तब वेश्याने कहा—राजन्! वह सामने बैठा हुआ पुरुष मेरा चोर है, उसे मरवा दीजिये।” जब राजाने उसके मारे जानेकी आज्ञा दे दी, तब साहूकारके लड़केने कहा—“इसके पास मेरी कुछ धरोहर है; इससे कहिये कि, यह हाथमें जल ले मुझे उसे कल्प कर के दे दे।” वेश्याने कहा—“मुप! तेरा मुझे क्या देना है? खौर, ले; मैं जल लेकर संकल्प करके कहती हूँ, कि जो कुछ
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वहीं बैठो रही । फ़क़ीरने देखा कि, स्त्री तो परमा सुन्दरी और नवयौवना है ; अतः उससे कहा—“तू मेरे साथ रहे, तो दुनिया के मज़े देखे । जा उसे कूप़में धकेल आ फिर अपने दोनों पासके शहरमें चल रहेंगे ।” साहूकारकी स्त्री, जो पतिके लिये प्राण देती थी, जो पतिके समझाने पर भी पीहर न गई थी, क्षणभरमें पराई हो गई । फ़क़ीरकी बातोंमें आकर वह कूपपर गई । ज्यों ही उसका पति छोटा ; खींचनेको झुका, उसने धक्का देकर उसे कूपमें गिरा दिया । उसे ज़रासी दया भी न आई । पीछे आकर वह फ़क़ीरके साथ होली । फ़क़ीर उसे नगरमें ले आया और उसके धनसे मौज करने लगा । साथ ही गाने-बजाने वाले उस्तादोंको बुलाकर, उसने गाने-बजानेकी तालीम दिलाने लगा । उसकी चढ़ती जवानी थी, रूप-लावण्य था ; अतः गानेमें भी वह पक्की हो गई । सारे शहरमें उसके नाचने-गानेकी शोहरत हो गई ।
उधर वह लड़का कूपमें पड़ा हुआ अपनी मुसीबत पर रोता था । कहँसि एक बनजारा आया । उसके साथ सौ दो सौ आदमी और बालध थे । वहाँ पड़ाव पड़ा । लोग रोटी बनानेका उद्योग करने लगे । कोई कूपपर पानी भरने गया । उसने ज्यों ही डोल फ़ाँसा कि, साहूकारके लड़के ने डोल पकड़ लिया । लोगोंने पूछा—“तू कौन है ?” उत्तर दिया—“मैं आफ़त का मारा मनुष्य हूँ । क़पाकर मुझे निकाल लो ।” लोगोंने मिल कर उसे बाहर खींच लिया । देखा तो वह पीला पड़ गया था ।