वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 309, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( २१२ )
यह उनके सामने ही विलाय जाय । फिर ऐसे चञ्चल धन पर अभिमान किस लिये ?
किसीने कहा है—
कितने सुफलिस हो गये, कितने तंबंगर हो गये ।
खाकमें जब मिल गये, दोनों बराबर हो गये ॥
धनी और निर्धन का भेद तभी तक है, जब तक कि मनुष्य जिनदा है, मरने पर सभी बराबर हो जाते हैं ।
गिरधर कवि कहते हैं—
कुरडलिया ।
दौलत पाय न कीजिये, सपनेमें अभिमान ।
चञ्चल जल दिन चारिकों, ठाउँ न रहत निदान ॥
ठाँउ न रहत निदान, जियत जगमें यश लीजै ।
मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही करै कीजै ॥
कह गिरधर कविराय, थरे यह सब घट तौलत ।
पाहुन निशिदिन चारि, रहत सब होके दौलत ॥
धनवान होकर सुपनेमें भी घमण्ड न करना चाहिये । जिस तरह चञ्चल जल चार दिन ठहरता है, फिर अपने स्थानसे चला जाता है, उसी तरह धन भी चार दिनका मिहमान होता है, सदा किसीके पास नहीं रहता। ऐसे चञ्चल, ऐसे अधिथ और चन्द्रोत्तम धनके नहोसे मतवाले होकर, ज्ञानको बेलगाँम न रखना