वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २११ )
पुरायेर्मूलफलैः प्रिये प्रणयिनि प्रीतिं कुरुत्वाद्युना
भृशम्या नववलकलैरकारैर्वृत्तिष्ठ यामो वनम् ॥
तुद्राणामविवेकमृदभनसां यत्रेशराणां सदा
चित्तव्याव्यविवेकनिहलगिरां नामापिन श्रूयेते ॥५६॥
ऐ प्यारी बुद्धि ! अब तू पवित्र फलमूलों से अपनी गुजर कर ; वनी-वनाई भूमि-शय्या और वृक्षों की छाल के वस्त्रों से अपना निर्वाह कर । उठ, हम तो वन को जाते हैं । वहाँ उन मुख और तंग-दिल अमीरों का नाम भी नहीं सुनाई देता, जिन की जवान धन की बीमारी के कारण उनके वश में नहीं है ॥५६॥
जिन धनवानों की जवान में लगाम नहीं है, जो अपनी धनकी बीमारी के कारण मुँह से चाहे जो निकाल बैठते हैं, ऐसे मद्भ्रम और नीच धनी जंगलों में नहीं रहते, इसलिये बुद्धिमान को वहाँ चला जाना चाहिये । वहाँ काहे का अभाव है ? खाने को फलमूल हैं, पीने को शीतल जल है, रहने को वृक्षोंकी शीतल छाया है, पहनने को वृक्षोंकी छाल है और सोने को पृथ्वी है । वहाँ दुःख नहीं है, अशान्ति नहीं है ; किन्तु और सभी जीवनधारणोपयोगी पदार्थ हैं ।
जो आशाको त्याग देंगे, वह तो धनियोंके दास होंगे ही क्यों ? पर धनियोंको भी इतराना न चाहिये । यह धन सदा उनके पास न रहेगा । इसे वे अपने साथ न ले जायेंगे । सम्भव है,