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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 588

( ४७० )

भजन ( ग़ज़ल ) ।

ऐ दिल ! क्यों हँस करता है, तुम्हें संसार क्या करना । सदा जंगलमें रहना है, तुम्हें घर-बार क्या करना ॥१॥ रहा मालो-मँका किसका ? जो रहवेगा तेरा बाकी । यहाँ दो दिनका जीना है, तुम्हें शृंगार क्या करना ॥२॥ हजारों नामवर गुजरे, नहीं जिनका निश्रा बाकी । ये सब दो दिनकी दुनियाँ हैं, तुम्हें ज़र तार क्या करना ॥३॥ उठा ले हाथ तू सबसे, खुदासे दिल लगा अपना । तुम्हें ये लाल याक़्तौके, गजरे हार क्या करना ॥४॥ वतन जागीरको लेकर, करेगा क्या बता तो दिल ! । लहदको याद कर अपनी, तुझे गुलज़ार क्या करना ॥५॥ ये सब दो दिनके साथी हैं, तेरे माँ बाप और भाई । जो मुश्किलमें नहीं साथी, उन्हें फिर प्यार क्या करना ॥६॥ कुजा रस्तम कुजा हातिम, कुजा लुकँमा कुजा दारा । हमा दर खाक़ शुद पिन्हॉ, तुम्हें इज़हार क्या करना ॥७॥ महल किसका ! मँका किसका ! किधर और जगह है तेरी ? । तू खुद इशियार है ऐ दिल ! तुम्हें इशियार क्या करना ? ॥८॥ दिल अपना इश्क़में माबूदके, रंग ले बहुत पक्का । तुम्हें ये रंग रेज़ीये, गुले अनार क्या करना ? ॥९॥