वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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क्षपय ।
भयो संकुचित गात, दन्तहु उखरि परे महि ।
आखिन दीखत नाहि, बदन ते लार परत वहि ॥
भई चाल बेचाल, हाल बेहाल भयो अति ।
बचन न मानत बन्धु, नारिहु तजी श्रीति-गति ॥
यह कष्ट महा दिये वृद्धपन, कहु सुख सों नहि कहि सकत ।
निज पुत्र अनादर कर कहत, यह बूढ़ो योंही बकत ॥१११॥
111. How pitiable is the old age of a man, when his limbs begin to contract, his gait becomes feeble, the rows of teeth are broken off, the eye-sight is gone, deafness is on the increase, the mouth begins to give water, the relatives do not show respect even by word, the wife ceases to serve and even the sons become unfriendly.
क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः
क्षणं चित्तेर्हीनः क्षणमपि च सम्पूर्णविभवः ॥
जराजीर्णैरंगेर्नेट इव वलीमंडिततुनरैः
संसारान्ते विशिति यमयानीजवनिकाम् ॥११२॥
मनुष्य नाटके ऐक्टके समान है ; जो क्षणभरमें बालक, क्षण-भरमें युवा और कामी रसिया बन जाता है तथा क्षणमें दरिद्र और क्षणमें धनैश्वर्य-पूर्ण हो जाता है । फिर; अन्तमें बुढ़ापेसे जीर्ण और सुकड़ी हुई खालका रूप दिखाकर, यमराजके नगरकों •बोटमें, छिप जाता है ॥११२॥