वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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क्षपय ।
भयो संकुचित गात, दन्तहु उखरि परे महि ।
आखिन दीखत नाहि, बदन ते लार परत वहि ॥
भई चाल बेचाल, हाल बेहाल भयो अति ।
बचन न मानत बन्धु, नारिहु तजी श्रीति-गति ॥
यह कष्ट महा दिये वृद्धपन, कहु सुख सों नहि कहि सकत ।
निज पुत्र अनादर कर कहत, यह बूढ़ो योंही बकत ॥१११॥
111. How pitiable is the old age of a man, when his limbs begin to contract, his gait becomes feeble, the rows of teeth are broken off, the eye-sight is gone, deafness is on the increase, the mouth begins to give water, the relatives do not show respect even by word, the wife ceases to serve and even the sons become unfriendly.
क्षणं बालो भूत्वा क्षणमपि युवा कामरसिकः
क्षणं चित्तेर्हीनः क्षणमपि च सम्पूर्णविभवः ॥
जराजीर्णैरंगेर्नेट इव वलीमंडिततुनरैः
संसारान्ते विशिति यमयानीजवनिकाम् ॥११२॥
मनुष्य नाटके ऐक्टके समान है ; जो क्षणभरमें बालक, क्षण-भरमें युवा और कामी रसिया बन जाता है तथा क्षणमें दरिद्र और क्षणमें धनैश्वर्य-पूर्ण हो जाता है । फिर; अन्तमें बुढ़ापेसे जीर्ण और सुकड़ी हुई खालका रूप दिखाकर, यमराजके नगरकों •बोटमें, छिप जाता है ॥११२॥
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महाराज भर्तृहरि जीने मनुष्यका नाटकके स्टेज-पेकूरसे खूबही अच्छा मिलान किया है। सचमुच ही मनुष्य नाटकके पेकूरका साही काम करता है।
थियेटरमें जिस तरह एक ही ऐकूर कभी बालक, कभी जवान, कभी बूढ़ा, कभी धनी, कभी निर्धन, कभी राजा, कभी फ़कीर, कभी साधु, कभी असाधु तथा कभी रोगी और निरोगी, त्यागी और अत्यागी, भोगी और योगी, गृहस्थ और संन्यासी बन कर, तरह-तरहके तमाशे दिखाता और शेषमें नाटकके पर्देके पीछे छिप जाता है ; उसी तरह मनुष्य बालक और जवान, धनी और निर्धन प्रभुतिके स्वाँग भर और दिखाकर, अन्तमें जीवन-नाटकका आखिरी सीन—बुढ़ापेका रूप—दिखा कर, यमपुरी-रूपी पर्देकी ओटमें जाकर छिप जाता है ; यानी इस दुनियासे कूच कर जाता है।
छप्पय।
छिनमें बालक होत, होत छिनहींमें यौवन।
छिन हीमें धनवन्त, होत छिन हीमें निर्धन ॥
होत छिनकमें वृद्ध, देह जर्जरता पावत।
नट ज्यों पलटत श्रंग, स्वाँग नित नये दिखावत ॥
यह जीवनाच नाना रचत, निचल्यो रहत न एकदम।
करके कनात संसारकी, कौतुक निरखत रहत यम ॥११२॥
112. A man is like a stage-actor. He is a child for a short space of time and then becomes young enjoying lustful pur-
This image shows a blank, off-white page, likely a flyleaf or endpaper from an old book. The page is mostly empty, with a few small, dark specks of dust or foxing scattered across its surface. A dark, textured vertical strip runs along the right edge, representing the book's binding or gutter. A dark horizontal strip is visible at the bottom, possibly a shadow or the edge of the book's cover. The overall appearance is that of a weathered, aged document.
वेरायशुतक
जिस तरह गुलाबखान, शंभूशाल, धाराव और सुमनेके ढलू में एक ही सूख्य का धारक पाएँगे है: उही तरह मनुष्य और पशु-पक्षी सब में एक ही अन्ध का प्रकाश है।
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suits. In one moment he is poor and in another the possessor of great wealth and power. Ultimately with limbs worn out with old age and a body covered all over with wrinkles he makes his exit entering the metropolis of the god of Death.
अहौ वा हारे वा बलवति रिषो वा सुहृदि वा ।
मणौ वा लोष्टे वा कुसुमशयनेवा दृषदि वा ॥
तृणे वा त्रैणे वा मम समदृशो यान्तु दिवसाः
कचित्पुण्यारण्ये शिवशिवशिवेति प्रलपतः ॥११२॥
हे परमात्मा ! मेरे शेष दिन, किसी पवित्र वनमें, “शिव शिव” रटते हुए बीतें ; सर्प और पुष्प-हार, बलवान शत्रु और मित्र, कोमल पुष्प-शय्या और पत्थरकी शिला, मणि और पत्थर, तिनका और सुन्दरी कामिनियोंके समूहमें मेरी समष्टि हो जाय, मेरी यही इच्छा है ॥११३॥
खुलासा—कोई विरक्त पुरुष परमात्मासे प्रार्थना करता है, कि मेरी मति ऐसी कर दे कि, मुझे सर्प और हार, शत्रु और मित्र, पुष्प-शय्या और शिला, रत्न और पत्थर, तिनका और सुन्दरी स्त्री सब एकसे दीखने लगे ; इनमें मुझे कुछ भेद न मालूम हो ; मैं समदर्शी हो जाऊँ और मेरा शेष जीवन किन्हीं पवित्र वनमें “शिव शिव शिव” जपते बीते ।
जब सभी शरीरोंमें एकही व्यापक ब्रह्म दीखने लगे ; शत्रु-मित्रमें भेद न मालूम हो ; हर्ष-शोक और दुःख-सुख सबमें
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चित्त एकसा रहे ; तब योगसिद्धि हुई समझनी चाहिये । कबोरा दास कहते हैं :—
समदृष्टि सतगुरु करें, मेरा भरम निकार । जहाँ देखों तहाँ एक ही, साहबका दीदार ॥ समदृष्टि तब जानिये, शीतल समता होय । सब जीवनकी आत्मा, लखै एकसी सोय ॥ समदृष्टि सतगुरु किया, भरम किया सब दूर । दूजा कोई दीखे नहीं, राम रहा भरपूर ॥
यही अवस्था सर्वोत्तम अवस्था है । इसीमें परमानन्द है । इस अवस्थामें शोक और दुःख का नाम भी नहीं है ; पर यह अवस्था उन्हींको प्राप्त होती है, जिन पर जगदीशकी कृपा होती है या जिनके पूर्व जन्मके सख्ति पुण्यों का उदय होता है ।
समदर्शी होने के उपाय ।
समदर्शिता ही परमानन्द की सीढ़ी है ।
चित्त की समता ही योग है । जब समान दृष्टि हो गई, तब योगसिद्धिमें बाकी ही क्या रहा ? जब मनुष्य को इस बात का ज्ञान हो जाता है, कि समस्त जगत् और जगत्के प्राणियों में एक ही चेतन आत्मा है ; छोटे-बड़े, नीचे-ऊँच सभी शरीरों में एक ही ब्रह्मका प्रकाश है ; तब उसकी नज़र में सभी स्रष्टा
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हो जाते हैं। जब वह राजा-महाराजा, अमीर और गरीब, मनुष्य और पशु-पक्षी, हाथी और चींटी, सर्प और मगर—सब में एक ही चेतन आत्माको व्यापक देखता है ; तब उसके दिल में किसी से राग और किसी से विराग, किसी से विरोध और किसी से प्रणय-भाव रह नहीं जाता ; उस समय उसे न कोई शत्रु दीखता है और न कोई मित्र। इस अवस्थामें पहुँचने पर, वह न किसीको अपना समझता है, न पराया। इस समय ही उसे स्त्री और पुरुष, दोस्त और दुश्मन, सर्प और पुष्प-हार, खोना और मिट्टी प्रभृति में कोई फर्क नहीं मालूम होता। इस अवस्थामें, उसके अन्तःकरण से दुःखों का घटाटोप दूर होकर, परमानन्द की प्राप्ति होती है। उस समय जो आनन्द होता है, उसको कलम से लिखकर बताना कठिन ही नहीं ; असम्भव है।
समस्त जगत् में एक ही आत्मा व्यापक है ?
—○—
बेशक, सारे जगत् में एक ही चेतन आत्मा है। जिस तरह गुलाब-जल से भरे घड़े में, गङ्गाजल से भरे घड़ेमें, सूख से भरे घड़े में और शराब से भरे घड़ेमें एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब—अक्सर पड़ता है, सबमें एकही सूर्य दीखता है, उसी तरह मनुष्य, पशु-पक्षी और मगर-मच्छ प्रभृति जगत्के सभी प्राणियों में एक ही चेतन ब्रह्म का प्रतिबिम्ब या प्रकाश है। अलग-अलग
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प्रकार के शरीरों या उपाधियोंके कारण, सबमें एक ही आत्मा होने पर भी, अलग-अलग आत्मा दीखते हैं। लेकिन भिन्न-भिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न आत्माओं का होना, अज्ञानियों को ही मालूम होता है; जो सच्चे तत्त्ववेत्ता और पूर्ण ज्ञानी हैं अथवा जो आत्मतत्त्व की तह तक पहुँच गये हैं, उन्हें सभी शरीरों में एक ही आत्मा दीखता है। वे समझते हैं कि, जो आत्मा हम में है, वही समस्त जगत् और जगत् के प्राणियों में है। बकरी के शरीर में जो आत्मा है, वह बकरी; हाथीके शरीर में जो आत्मा है, वह हाथी; और मनुष्यके शरीर में जो आत्मा है, वह मनुष्य कहलाता है। जिन-जिन शरीरों में आत्मा प्रवेश कर गया है, उन्हीं-उन्हीं शरीरों के नाम से वह पुकारा जाता है; शरीरों या उपाधियों का भेद है; आत्मा में कोई भेद नहीं। नदी, तालाब, फील, बावड़ी, भरना, सोता और कुआँ—इन सब में एक ही जल है, पर नाम अलग-अलग हैं। दीपक, मशाल, चिराग और अग्नि सबमें एक ही अग्नि है, पर नाम अलग-अलग हैं। एक लोहेके डण्डे पर कपड़ा लपेट कर जो अग्नि जलाई जाती है, उसे मशाल कहते हैं और एक मिट्टी के दीबलेमें जो अग्नि जलती है, उसे दीपक कहते हैं। पृथ्वी एकही है, पर उसके नाम अलग-अलग हैं। किसी को नगर, किसी को गाँव, किसी को दानी और किसी को घर कहते हैं; पर है तो सब धरती ही। ताना और बाना एक ही सूतके दो नाम हैं; पर है दोनों में ही सूत। वन एकही है; उसमें अनेक
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वृक्ष है और उनके नाम तथा जातियाँ अलग-अलग हैं। बीज से वृक्ष होता है और वृक्ष से बीज होता है ; अतः बीज वृक्ष है और वृक्ष बीज है। दोनों एक ही हैं, पर नाम अलग-अलग हैं। बापसे बेटा पैदा होता है ; अतः बाप में और बेटे में एक ही आत्मा है, अतएव बाप बेटा है और बेटा बाप है। बहुत कहना-समझाना वृथा है। निश्चय ही सबमें एकही चेतन आत्मा है, पर भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों के कारण नाम अलग-अलग हैं। भ्रम के कारण मनुष्य को असल बात समझ नहीं पड़ती। मुगमरीचिका में जल नहीं है ; पर भ्रमवश मनुष्य को जल दीख पड़ता है और वह कपड़े उतार कर तेरने को तैयार हो जाता है। रस्सी-रस्सी है, साँप नहीं, पर अंधेरे में वही रस्सी साँप सी दीखती है और मनुष्य डर कर उछलता और भागता है। इसी तरह जब तक मनुष्यके हृदय में अज्ञान रूपी अन्धकार रहता है, उसे और का और दीखता है। देह और आत्मा अलग-अलग हैं। देह नाशमान् और आत्मा अविनाशी है ; पर अज्ञानी को, जिसके दिल में अंधेरा है, देह और आत्मा एक मालूम होते हैं तथा शरीर और आत्मा दोनों ही नाशमान् जान पड़ते हैं। इसी तरह सब जगत् में एक ब्रह्म व्यापक है—शरीर-शरीरमें एक ही चेतन आत्मा है ; पर अज्ञानी सब प्राणियोंमें एक ही आत्मा नहीं मानता है। अज्ञान-अन्धकारके मारे, वह इस बातको नहीं समझता, कि मुक्तमें, ऊधोमें, माधवमें, रामामें, मेरी खीमें मेरे पुत्रमें,
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माधवके पुत्रमें, घोड़ेमें, हाथीमें, सर्पमें और सिंहमें एक ही आत्मा है; यानी जो आत्मा मुझमें है वही समस्त जगत्में है। विहारीलाल कविने कहा है :—
मोहन मूरति श्यामकी, अति श्रद्धुभुत गति जोड़।
वसत सुचित्र अन्तर तज, प्रतिबिम्बित जग होइ ॥
श्यामकी मोहिनी मूरतकी गति अति अद्भुत है। वह सुन्दर हृदयमें रहता है, तोभी उसका प्रतिबिम्ब—अक्स—सारे जगत्में पड़ता है।
महाकवि नज़ीर कहते हैं :—
ये एकताई ये यकरंगी, तिस ऊपर यह क़्यामत है।
न कम होना न बढ़ना और हजारों घटमें बँट जाना ॥
ईश्वर एक है और एक रंग है—निर्विकार और अक्षय है; उसमें रूपान्तर नहीं होता और वह घटता-बढ़ता भी नहीं; लेकिन अवशेषकी बात है कि, वह घट-घटमें इस तरह प्रकट होता है, जिस तरह एक सूर्यका प्रतिबिम्ब सैकड़ों जलाशयों में दिखाई देता है।
क्या जीवात्मा और परमात्मामें भी कुछ भेद नहीं है ?
निस्सन्देह ; जीवात्मा और परमात्मामें कोई भेद नहीं है। दोनोंमें एकही आत्मा है। जीवको उपाधि अन्तःकरण है और
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परमेश्वरकी उपाधि माया है। जीवकी उपाधि छोटी है और परमात्माकी बड़ी है; इसीसे ईश्वरमें जो सर्वश्रुता प्रभुति धर्म है; जीवमें वे नहीं। गङ्गाकी बड़ी धारामें नाव और जहाज चलते हैं, हज़ारों मगर-मच्छ और करोड़ों मछलियाँ तैरती हैं तथा किनारे पर लोग स्नान करते हैं। पर वही गङ्गाजल अगर एक गिलासमें भर लिया जाय, तो उसमें न तो नाव और जहाज होंगे, न मगर-मच्छ और मछलियाँ होंगी और न किनारेपर लोग स्नान करते होंगे। दर-असल, गङ्गाकी बड़ी धारामें जो जल है, वही जल गिलास में है। वह गङ्गाका बड़ा प्रवाह है और गिलासमें थोड़ासा जल है। जिस तरह दोनों जलोंके एक होनेमें सन्देह नहीं; उसी तरह जीवात्मा और परमात्माके एक होनेमें सन्देह नहीं। सारांश यह कि, जीवात्मा, परमात्मा और समस्त जगत्में एक ही ब्रह्म है। जो इस बातकी तह तक पहुँच जायगा, वह किससे वैर करेगा और किससे प्रीति? जब तक मनुष्य इस बातको अच्छी तरह नहीं समझ लेता और यही बात उसके दिल पर नक्श हुई नहीं रहती कि, जो आत्मा मेरे शरीर में है वही जगत्के और प्राणियोंके शरीरोंमें है, तभी तक वह किसी को अपना और किसी को पराया, किसी की अपनी-खी और किसी को अपना पुत्र, किसी को शत्रु और किसी-को मित्र, किसी को सर्प और किसी को फूलोंका हार समझता है; किसी से खुश होता है और किसी से नाराज़, किसी से
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विरोध करता और किसी से प्रणय । पहले के पहुँचे हुए महात्मा जो सिंहों को अपने आश्रमों में भेड़ बकरी की तरह पालते और सर्पोंको गले का हार बनाये रहते थे, वह क्या बात है ? और कुछ नहीं, यही बात है, कि वे भीतरी दिल से सिंह में और अपने में एक ही आत्मा समझते थे ; इसी से वे उनसे डरते नहीं थे और सिंह तथा सर्प प्रभुति हितक जीव भी उन्हें कष्ट न पहुँचाते थे ।
कैवल्योपनिषद् में लिखा है:—
यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा, विश्वस्यायतन महत् ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यं स त्वमेव त्वमेव तत् ॥
जो ब्रह्म सब प्राणियोंका आत्मा, सम्पूर्ण विश्वका आधार, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और नित्य है, वह तुही है और तू वही है ।
ज्ञानकाण्ड उपनिषत् ही तो वेदका निष्कर्ष और सार है । उसमें सर्वत्र आत्माको ही ईश्वर कहा है । हमारे वेद ही नहीं, संसारके समस्त धर्मशास्त्र—कुरान और बाइबिल आदिमें भी यही बात कही है । कुरानमें “ला इलाहा इल्ला अल्ला” यही निबोड़ कहा है, यानी आत्माके सिवा दूसरा और ईश्वर नहीं है । बाइबिलमें भी ईसासीहने कहा है—“Ye are the living temples of God.” अर्थात् तुम ईश्वरके जीवित मन्दिर हो ; अर्थात् “तत्त्वमसि ।” वह तुम हो ।
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समदर्शी होने से मोक्ष मिलती है।
“समस्त जगतमें एक हो ब्रह्म या चेतन आत्मा व्यापक है— इस बातको जाने-समझे बिना, मनुष्य समदर्शी हो नहीं सकता इसी से हमने यह बात विस्तार से समझाई है। अब रही यह बात कि, समदर्शी होनेकी क्या जरूरत है ? समदृष्टि होनेसे क्या लाभ है ? इस प्रश्नोंका उत्तर हम संक्षेपमें ही दिये देते हैं :— समदृष्टि हो जाने से मनुष्य का दुःख और क्रोधों से पीड़ा छूट जाता है ; वर्णनातीत परमानन्द की प्राप्ति होती है ; संसार-बन्धन कट जाता है ; आवागमन का भगड़ा मिट जाता है ; प्राणी को बारम्बार जन्म लेना और मरना नहीं पड़ता ; उस की मोक्ष हो जाती है और वह परमपद या विष्णुत्वको प्राप्त हो जाता है। स्वामी शङ्कराचार्य जी महाराज कहते हैं :—
शत्रौ मिले पुने वन्द्यो, मा कुरु यत्नं विग्रहसनयो।
भव समचितः सर्वत्र त्वं, वाञ्छित्यचिराद यदि विष्णुत्वम् ॥
हे मनुष्य ! यदि तू शीघ्र ही मोक्ष* या विष्णुत्व चाहता है,
❖ “मोक्ष” किसी पदार्थका नाम नहीं है और वह किसी देश या दूसरी दुनियामें नहीं मिलती। हृदयमें जो अज्ञान की गांठ है, उसके खुल जाने या नाश हो जानेको ही “मोक्ष” कहते हैं !
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तो शत्रु और मित्र, पुत्र और बन्धुओंसे विरोध और प्रणय मत कर; यानी सब को एक नज़र से देख, किसीमें भेद न समझ।
सार—यदि मोक्ष, मुक्ति या परमानन्द चाहते हो; तो सब जगत्में अपने ही आत्मा को देखो, किसीको अपना और किसी को पराया, किसी को शत्रु और किसी को मित्र मत समझो।
व्यप्य ।
सर्प सुमनको हार, उग्र बैरी धरु सज्जन ।
कंचन मणि धरु लोह, कुसुम शय्या धरु पाहन ।
तुण धरु तरुणी नारि, सबन पर एक दृष्टि चित ।
कहूं राग नहि रोष, द्वेष किराहुँ न कहूं हिल ।
शरीर आत्मा नहीं हैं। शरीरको आत्मा समझना “अविद्या” है। अविद्याके कारण ही संसार-बन्धन है। उस बन्धनके नाश को ही “मोक्ष” कहते हैं।
कामनाओंका हृदयमें जो निवास है, उसको “संसार” कहते हैं। कामनाओंके सब तरहसे नाश हो जानेको “मोक्ष” कहते हैं।
सुक दुःखा पुरुष फिर संसारमें नहीं आता। सांख्यसूत्र है—“यद्वत्त्व न निवत्तन्ते तद्दाम परमं मम।” जिस पदको पोंकर फिर नहीं लौटता, वही मेरा परम स्वरूप है।
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हवै है कब मेरी यह दशा, गंगाके तट तप जपत ।
रस मीने दुर्लभ दिवस ये, बीतेगें शिव शिव जपत ॥१११॥
113. O lord, let my remaining days be now spent repeating the name of Shiva in some holy forest, my sight making no difference between a serpent or a garland of flowers, between a powerful enemy or a friend, between a precious gem or an ordinary stone, between a bed made soft by flowers or a flat stone, and between a straw or a group of beautiful women.
समाप्त ।
सारतत्त्व
इस ग्रन्थके ४२६ पेजोंमें और करोड़ों वेदान्त-ग्रन्थोंमें जो विषय कहा गया है, उसे हम आधे श्लोकमें कह देते हैं:—
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या, जीवो ब्रह्मेवनाऽपरः ।
ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है और जीव ब्रह्मरूप है ।
प्रश्नोत्तरी
आत्मा-सम्बन्धी-प्रश्नोत्तर ।
( १ ) प्रश्न—आत्मा कैसा है ?
उ०—आत्मा अचिन्त्य, अनन्तरूप, कल्याणरूप, अमृत, प्राया का भी कारण, आदि-मध्य और अन्तसे हीन, चिन्म, एक आनन्द रूप और अद्वुत है ।
( २ ) प्रश्न—क्या सब प्राणियोंमें एक ही आत्मा है ?
उ०—निरसन्देह, सभी प्राणियोंमें एकही आत्मा है । श्वेतां श्वतरोपनिषद् में लिखा है—“एक ही चेतन देव सारे भूतों में छिपा हुआ है । वही सबमें व्याप रहा है और वही सब भूतोंका अन्तरात्मा है । वही कर्मों का अध्यक्ष या ज्ञाता सब भूतों को निवासस्थान, साक्षी, चेतन, द्रष्ट से रहित और निर्गुण है ।
( ३ ) प्र०—क्या शरीर और आत्मा दो अलग-अलग पदार्थ हैं ?
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३०—बेशक, शरीर और आत्मा दो अलग-अलग पदार्थ हैं। शरीर जड़ और नाशमान् है ; किन्तु आत्मा चेतन और अविनाशी है। शरीर रहने का घर और आत्मा उसमें रहनेवाला है।
( ४ ) प्र०—जीवन और मरण अथवा जन्म और मृत्यु कित्ते कहते हैं ?
३०—शरीर और आत्मा के संयोग को जीवन और इनके वियोग को मरण कहते हैं। जब आत्मा नये शरीर में प्रवेश करके संसारमें आता है, तब कहते हैं कि जन्म हुआ और जब आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर चल देता है, तब कहते हैं कि मृत्यु हुई।
( ५ ) प्र०—क्या यह शरीर ही आत्मा नहीं है ?
३०—नहीं, यह देह या शरीर या चोला मनुष्य नहीं है। इस देह को धारण करनेवाला अथवा इस देह में बसनेवाला एक सूक्ष्म से भी सूक्ष्म पदार्थ है, जो हृदय के अन्दर रहता है, उसे ही मनुष्य, जीवात्मा, देही या शरीरी कहते हैं।
( ६ ) प्र०—बचपन, जवानी और बुढ़ापा,—ये अवस्थायें किस की होती हैं, आत्माकी या शरीर की ?
३०—बचपन, जवानी और बुढ़ापा,—ये अवस्थायें शरीरकी होती हैं, आत्माकी नहीं। शरीर की अवस्थायें बदलती रहती हैं, मगर शरीर के अन्दर रहनेवाला जीवात्मा सदा जैसा का तैसा बना रहता है। शरीरकी अवस्था बदलने पर, उसकी अवस्था में कुछ भी फेरफार नहीं होता। बचपन के
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शरीर में आत्मा जैसा रहता है, जवानी और बुढ़ापे के शरीर में भी वैसा ही रहता है। मतलब यह, आत्मा सदा एक सा रहता है, वह न कभी बच्चा होता है, न बूढ़ा और जवान।
( ७ ) शरीरके साथ जो आत्मा या चेतन वस्तु पैदा होती है, वह क्या शरीरके साथ ही नाश नहीं हो जाती ?
३०—शरीरके साथ जो चेतन वस्तु या आत्मा पैदा होती है, वह शरीरके नाश होने पर नाश नहीं हो जाती। शरीर नष्ट हो जाता है, पर उसके अन्दर रहनेवाला आत्मा नाश नहीं होता; वह अपने कर्मानुसार फिर नया शरीर पाता है। हम लोग जिस तरह आज हैं, उसी तरह पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। हमने अब तक अनगिन्ती जन्म लिये हैं और आगे भी, जब तक मोक्ष न हो जायगी, इसी तरह जन्म लेते और मरते रहेंगे। देखनेमें आता है, कि माँके पेटसे निकलते ही बालकको हर्ष, शोक और भय आदि होने लगते हैं। हालके पैदा हुए बालकको अपने पहले जन्मकी हर्ष, शोक और भय पैदा करनेवाली बातें याद होती हैं, इसीसे वह हँसता डरता और रोता है। अगर हालके जन्मे बालकने पहले कभी जन्म-न लिया होता, तो वह पैदा होते ही, अपनी भूख शान्त करनेके लिए, माँके स्तनोंको खोज कर उनसे लग्न जाता। बालकने पहले अनेक जन्म लिये हैं और प्रत्येक बार माताओंके स्तन-पान किये हैं; इस बार भी उसे पहले जन्मकी बात याद है, उसे स्तन-पानका अनुभव है, दूध पीनेके लाभका
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ज्ञान है ; इसीसे वह इस जन्ममें, पैदा होते ही, बिना किसीके सिखाये, स्तन पीने लगता है। इससे साफ मालूम होता है कि हालके जन्मे वन्धेके मीतर चैतन्य वस्तु—आत्मा है और वह पहले जन्ममें भी था। उसी आत्माने अपना पहला शरीर छोड़ कर, इस नये शरीरमें प्रवेश किया है। उस बालकका पहला शरीर नाश हो गया है, पर उसके अन्दर रहनेवाला आत्मा ज्यों का त्यों है ; वह पुराने शरीरोंको त्याग-त्याग कर नये-नये शरीर धारण करता है। शरीर नाश होते जाते हैं, मगर आत्मा कभी नाश नहीं होता। इसीसे शास्त्रोंमें आत्माको अमर और अविनाशी तथा नित्य या सदा-सर्वदा रहनेवाला कहा है।
(८) प्रश्न—शरीर और आत्माका मुकाबला करो।
उ०—शरीरमें रहनेवाला आत्मा नित्य, अविनाशी, अक्षय, निराकार, निर्विकार, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अजर और अमर है ; किन्तु शरीर अनित्य, नाशमान्, घटने-बढ़नेवाला, साकार, विकारवान्, शूल और बूढ़ होने तथा मरनेवाला है।
आत्मा कभी मरता नहीं, सदा रहा आता है, इसीसे उसे नित्य कहते हैं। आत्माका कभी नाश नहीं होता, कोई भी उसका नाश नहीं कर सकता। मनुष्यकी तो बात ही क्या है, स्वयं जगदीश परम परमात्मा भी, आत्माका नाश नहीं कर सकता ; क्योंकि आत्मा स्वयं ही ब्रह्म है, कोई भी, अपना नाश आप नहीं कर सकता। आग आत्माको जला