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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४८२ )

तो शत्रु और मित्र, पुत्र और बन्धुओंसे विरोध और प्रणय मत कर; यानी सब को एक नज़र से देख, किसीमें भेद न समझ।

सार—यदि मोक्ष, मुक्ति या परमानन्द चाहते हो; तो सब जगत्में अपने ही आत्मा को देखो, किसीको अपना और किसी को पराया, किसी को शत्रु और किसी को मित्र मत समझो।

व्यप्य ।

सर्प सुमनको हार, उग्र बैरी धरु सज्जन ।

कंचन मणि धरु लोह, कुसुम शय्या धरु पाहन ।

तुण धरु तरुणी नारि, सबन पर एक दृष्टि चित ।

कहूं राग नहि रोष, द्वेष किराहुँ न कहूं हिल ।

शरीर आत्मा नहीं हैं। शरीरको आत्मा समझना “अविद्या” है। अविद्याके कारण ही संसार-बन्धन है। उस बन्धनके नाश को ही “मोक्ष” कहते हैं।

कामनाओंका हृदयमें जो निवास है, उसको “संसार” कहते हैं। कामनाओंके सब तरहसे नाश हो जानेको “मोक्ष” कहते हैं।

सुक दुःखा पुरुष फिर संसारमें नहीं आता। सांख्यसूत्र है—“यद्वत्त्व न निवत्तन्ते तद्दाम परमं मम।” जिस पदको पोंकर फिर नहीं लौटता, वही मेरा परम स्वरूप है।