सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 601

( ४८१ )

समदर्शी होने से मोक्ष मिलती है।

“समस्त जगतमें एक हो ब्रह्म या चेतन आत्मा व्यापक है— इस बातको जाने-समझे बिना, मनुष्य समदर्शी हो नहीं सकता इसी से हमने यह बात विस्तार से समझाई है। अब रही यह बात कि, समदर्शी होनेकी क्या जरूरत है ? समदृष्टि होनेसे क्या लाभ है ? इस प्रश्नोंका उत्तर हम संक्षेपमें ही दिये देते हैं :— समदृष्टि हो जाने से मनुष्य का दुःख और क्रोधों से पीड़ा छूट जाता है ; वर्णनातीत परमानन्द की प्राप्ति होती है ; संसार-बन्धन कट जाता है ; आवागमन का भगड़ा मिट जाता है ; प्राणी को बारम्बार जन्म लेना और मरना नहीं पड़ता ; उस की मोक्ष हो जाती है और वह परमपद या विष्णुत्वको प्राप्त हो जाता है। स्वामी शङ्कराचार्य जी महाराज कहते हैं :—

शत्रौ मिले पुने वन्द्यो, मा कुरु यत्नं विग्रहसनयो।

भव समचितः सर्वत्र त्वं, वाञ्छित्यचिराद यदि विष्णुत्वम् ॥

हे मनुष्य ! यदि तू शीघ्र ही मोक्ष* या विष्णुत्व चाहता है,

❖ “मोक्ष” किसी पदार्थका नाम नहीं है और वह किसी देश या दूसरी दुनियामें नहीं मिलती। हृदयमें जो अज्ञान की गांठ है, उसके खुल जाने या नाश हो जानेको ही “मोक्ष” कहते हैं !

३१

वैराग्य शतक · पृष्ठ 601, कुल 648 में से · BharatKosha