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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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विरोध करता और किसी से प्रणय । पहले के पहुँचे हुए महात्मा जो सिंहों को अपने आश्रमों में भेड़ बकरी की तरह पालते और सर्पोंको गले का हार बनाये रहते थे, वह क्या बात है ? और कुछ नहीं, यही बात है, कि वे भीतरी दिल से सिंह में और अपने में एक ही आत्मा समझते थे ; इसी से वे उनसे डरते नहीं थे और सिंह तथा सर्प प्रभुति हितक जीव भी उन्हें कष्ट न पहुँचाते थे ।

कैवल्योपनिषद् में लिखा है:—

यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा, विश्वस्यायतन महत् ।

सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यं स त्वमेव त्वमेव तत् ॥

जो ब्रह्म सब प्राणियोंका आत्मा, सम्पूर्ण विश्वका आधार, सूक्ष्म से भी सूक्ष्म और नित्य है, वह तुही है और तू वही है ।

ज्ञानकाण्ड उपनिषत् ही तो वेदका निष्कर्ष और सार है । उसमें सर्वत्र आत्माको ही ईश्वर कहा है । हमारे वेद ही नहीं, संसारके समस्त धर्मशास्त्र—कुरान और बाइबिल आदिमें भी यही बात कही है । कुरानमें “ला इलाहा इल्ला अल्ला” यही निबोड़ कहा है, यानी आत्माके सिवा दूसरा और ईश्वर नहीं है । बाइबिलमें भी ईसासीहने कहा है—“Ye are the living temples of God.” अर्थात् तुम ईश्वरके जीवित मन्दिर हो ; अर्थात् “तत्त्वमसि ।” वह तुम हो ।