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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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पृष्ठ 599

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परमेश्वरकी उपाधि माया है। जीवकी उपाधि छोटी है और परमात्माकी बड़ी है; इसीसे ईश्वरमें जो सर्वश्रुता प्रभुति धर्म है; जीवमें वे नहीं। गङ्गाकी बड़ी धारामें नाव और जहाज चलते हैं, हज़ारों मगर-मच्छ और करोड़ों मछलियाँ तैरती हैं तथा किनारे पर लोग स्नान करते हैं। पर वही गङ्गाजल अगर एक गिलासमें भर लिया जाय, तो उसमें न तो नाव और जहाज होंगे, न मगर-मच्छ और मछलियाँ होंगी और न किनारेपर लोग स्नान करते होंगे। दर-असल, गङ्गाकी बड़ी धारामें जो जल है, वही जल गिलास में है। वह गङ्गाका बड़ा प्रवाह है और गिलासमें थोड़ासा जल है। जिस तरह दोनों जलोंके एक होनेमें सन्देह नहीं; उसी तरह जीवात्मा और परमात्माके एक होनेमें सन्देह नहीं। सारांश यह कि, जीवात्मा, परमात्मा और समस्त जगत्में एक ही ब्रह्म है। जो इस बातकी तह तक पहुँच जायगा, वह किससे वैर करेगा और किससे प्रीति? जब तक मनुष्य इस बातको अच्छी तरह नहीं समझ लेता और यही बात उसके दिल पर नक्श हुई नहीं रहती कि, जो आत्मा मेरे शरीर में है वही जगत्के और प्राणियोंके शरीरोंमें है, तभी तक वह किसी को अपना और किसी को पराया, किसी की अपनी-खी और किसी को अपना पुत्र, किसी को शत्रु और किसी-को मित्र, किसी को सर्प और किसी को फूलोंका हार समझता है; किसी से खुश होता है और किसी से नाराज़, किसी से