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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४७८ )

माधवके पुत्रमें, घोड़ेमें, हाथीमें, सर्पमें और सिंहमें एक ही आत्मा है; यानी जो आत्मा मुझमें है वही समस्त जगत्में है। विहारीलाल कविने कहा है :—

मोहन मूरति श्यामकी, अति श्रद्धुभुत गति जोड़।

वसत सुचित्र अन्तर तज, प्रतिबिम्बित जग होइ ॥

श्यामकी मोहिनी मूरतकी गति अति अद्भुत है। वह सुन्दर हृदयमें रहता है, तोभी उसका प्रतिबिम्ब—अक्स—सारे जगत्में पड़ता है।

महाकवि नज़ीर कहते हैं :—

ये एकताई ये यकरंगी, तिस ऊपर यह क़्यामत है।

न कम होना न बढ़ना और हजारों घटमें बँट जाना ॥

ईश्वर एक है और एक रंग है—निर्विकार और अक्षय है; उसमें रूपान्तर नहीं होता और वह घटता-बढ़ता भी नहीं; लेकिन अवशेषकी बात है कि, वह घट-घटमें इस तरह प्रकट होता है, जिस तरह एक सूर्यका प्रतिबिम्ब सैकड़ों जलाशयों में दिखाई देता है।

क्या जीवात्मा और परमात्मामें भी कुछ भेद नहीं है ?

निस्सन्देह ; जीवात्मा और परमात्मामें कोई भेद नहीं है। दोनोंमें एकही आत्मा है। जीवको उपाधि अन्तःकरण है और