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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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वृक्ष है और उनके नाम तथा जातियाँ अलग-अलग हैं। बीज से वृक्ष होता है और वृक्ष से बीज होता है ; अतः बीज वृक्ष है और वृक्ष बीज है। दोनों एक ही हैं, पर नाम अलग-अलग हैं। बापसे बेटा पैदा होता है ; अतः बाप में और बेटे में एक ही आत्मा है, अतएव बाप बेटा है और बेटा बाप है। बहुत कहना-समझाना वृथा है। निश्चय ही सबमें एकही चेतन आत्मा है, पर भिन्न-भिन्न प्रकार के शरीरों के कारण नाम अलग-अलग हैं। भ्रम के कारण मनुष्य को असल बात समझ नहीं पड़ती। मुगमरीचिका में जल नहीं है ; पर भ्रमवश मनुष्य को जल दीख पड़ता है और वह कपड़े उतार कर तेरने को तैयार हो जाता है। रस्सी-रस्सी है, साँप नहीं, पर अंधेरे में वही रस्सी साँप सी दीखती है और मनुष्य डर कर उछलता और भागता है। इसी तरह जब तक मनुष्यके हृदय में अज्ञान रूपी अन्धकार रहता है, उसे और का और दीखता है। देह और आत्मा अलग-अलग हैं। देह नाशमान् और आत्मा अविनाशी है ; पर अज्ञानी को, जिसके दिल में अंधेरा है, देह और आत्मा एक मालूम होते हैं तथा शरीर और आत्मा दोनों ही नाशमान् जान पड़ते हैं। इसी तरह सब जगत् में एक ब्रह्म व्यापक है—शरीर-शरीरमें एक ही चेतन आत्मा है ; पर अज्ञानी सब प्राणियोंमें एक ही आत्मा नहीं मानता है। अज्ञान-अन्धकारके मारे, वह इस बातको नहीं समझता, कि मुक्तमें, ऊधोमें, माधवमें, रामामें, मेरी खीमें मेरे पुत्रमें,