सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 596, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 596

( ४७६ )

प्रकार के शरीरों या उपाधियोंके कारण, सबमें एक ही आत्मा होने पर भी, अलग-अलग आत्मा दीखते हैं। लेकिन भिन्न-भिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न आत्माओं का होना, अज्ञानियों को ही मालूम होता है; जो सच्चे तत्त्ववेत्ता और पूर्ण ज्ञानी हैं अथवा जो आत्मतत्त्व की तह तक पहुँच गये हैं, उन्हें सभी शरीरों में एक ही आत्मा दीखता है। वे समझते हैं कि, जो आत्मा हम में है, वही समस्त जगत् और जगत् के प्राणियों में है। बकरी के शरीर में जो आत्मा है, वह बकरी; हाथीके शरीर में जो आत्मा है, वह हाथी; और मनुष्यके शरीर में जो आत्मा है, वह मनुष्य कहलाता है। जिन-जिन शरीरों में आत्मा प्रवेश कर गया है, उन्हीं-उन्हीं शरीरों के नाम से वह पुकारा जाता है; शरीरों या उपाधियों का भेद है; आत्मा में कोई भेद नहीं। नदी, तालाब, फील, बावड़ी, भरना, सोता और कुआँ—इन सब में एक ही जल है, पर नाम अलग-अलग हैं। दीपक, मशाल, चिराग और अग्नि सबमें एक ही अग्नि है, पर नाम अलग-अलग हैं। एक लोहेके डण्डे पर कपड़ा लपेट कर जो अग्नि जलाई जाती है, उसे मशाल कहते हैं और एक मिट्टी के दीबलेमें जो अग्नि जलती है, उसे दीपक कहते हैं। पृथ्वी एकही है, पर उसके नाम अलग-अलग हैं। किसी को नगर, किसी को गाँव, किसी को दानी और किसी को घर कहते हैं; पर है तो सब धरती ही। ताना और बाना एक ही सूतके दो नाम हैं; पर है दोनों में ही सूत। वन एकही है; उसमें अनेक