सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 595, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 595

( ४७५ )

हो जाते हैं। जब वह राजा-महाराजा, अमीर और गरीब, मनुष्य और पशु-पक्षी, हाथी और चींटी, सर्प और मगर—सब में एक ही चेतन आत्माको व्यापक देखता है ; तब उसके दिल में किसी से राग और किसी से विराग, किसी से विरोध और किसी से प्रणय-भाव रह नहीं जाता ; उस समय उसे न कोई शत्रु दीखता है और न कोई मित्र। इस अवस्थामें पहुँचने पर, वह न किसीको अपना समझता है, न पराया। इस समय ही उसे स्त्री और पुरुष, दोस्त और दुश्मन, सर्प और पुष्प-हार, खोना और मिट्टी प्रभृति में कोई फर्क नहीं मालूम होता। इस अवस्थामें, उसके अन्तःकरण से दुःखों का घटाटोप दूर होकर, परमानन्द की प्राप्ति होती है। उस समय जो आनन्द होता है, उसको कलम से लिखकर बताना कठिन ही नहीं ; असम्भव है।

समस्त जगत् में एक ही आत्मा व्यापक है ?

—○—

बेशक, सारे जगत् में एक ही चेतन आत्मा है। जिस तरह गुलाब-जल से भरे घड़े में, गङ्गाजल से भरे घड़ेमें, सूख से भरे घड़े में और शराब से भरे घड़ेमें एक ही सूर्य का प्रतिबिम्ब—अक्सर पड़ता है, सबमें एकही सूर्य दीखता है, उसी तरह मनुष्य, पशु-पक्षी और मगर-मच्छ प्रभृति जगत्के सभी प्राणियों में एक ही चेतन ब्रह्म का प्रतिबिम्ब या प्रकाश है। अलग-अलग