वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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३०—बेशक, शरीर और आत्मा दो अलग-अलग पदार्थ हैं। शरीर जड़ और नाशमान् है ; किन्तु आत्मा चेतन और अविनाशी है। शरीर रहने का घर और आत्मा उसमें रहनेवाला है।
( ४ ) प्र०—जीवन और मरण अथवा जन्म और मृत्यु कित्ते कहते हैं ?
३०—शरीर और आत्मा के संयोग को जीवन और इनके वियोग को मरण कहते हैं। जब आत्मा नये शरीर में प्रवेश करके संसारमें आता है, तब कहते हैं कि जन्म हुआ और जब आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर चल देता है, तब कहते हैं कि मृत्यु हुई।
( ५ ) प्र०—क्या यह शरीर ही आत्मा नहीं है ?
३०—नहीं, यह देह या शरीर या चोला मनुष्य नहीं है। इस देह को धारण करनेवाला अथवा इस देह में बसनेवाला एक सूक्ष्म से भी सूक्ष्म पदार्थ है, जो हृदय के अन्दर रहता है, उसे ही मनुष्य, जीवात्मा, देही या शरीरी कहते हैं।
( ६ ) प्र०—बचपन, जवानी और बुढ़ापा,—ये अवस्थायें किस की होती हैं, आत्माकी या शरीर की ?
३०—बचपन, जवानी और बुढ़ापा,—ये अवस्थायें शरीरकी होती हैं, आत्माकी नहीं। शरीर की अवस्थायें बदलती रहती हैं, मगर शरीर के अन्दर रहनेवाला जीवात्मा सदा जैसा का तैसा बना रहता है। शरीरकी अवस्था बदलने पर, उसकी अवस्था में कुछ भी फेरफार नहीं होता। बचपन के