वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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शरीर में आत्मा जैसा रहता है, जवानी और बुढ़ापे के शरीर में भी वैसा ही रहता है। मतलब यह, आत्मा सदा एक सा रहता है, वह न कभी बच्चा होता है, न बूढ़ा और जवान।
( ७ ) शरीरके साथ जो आत्मा या चेतन वस्तु पैदा होती है, वह क्या शरीरके साथ ही नाश नहीं हो जाती ?
३०—शरीरके साथ जो चेतन वस्तु या आत्मा पैदा होती है, वह शरीरके नाश होने पर नाश नहीं हो जाती। शरीर नष्ट हो जाता है, पर उसके अन्दर रहनेवाला आत्मा नाश नहीं होता; वह अपने कर्मानुसार फिर नया शरीर पाता है। हम लोग जिस तरह आज हैं, उसी तरह पहले भी थे और आगे भी रहेंगे। हमने अब तक अनगिन्ती जन्म लिये हैं और आगे भी, जब तक मोक्ष न हो जायगी, इसी तरह जन्म लेते और मरते रहेंगे। देखनेमें आता है, कि माँके पेटसे निकलते ही बालकको हर्ष, शोक और भय आदि होने लगते हैं। हालके पैदा हुए बालकको अपने पहले जन्मकी हर्ष, शोक और भय पैदा करनेवाली बातें याद होती हैं, इसीसे वह हँसता डरता और रोता है। अगर हालके जन्मे बालकने पहले कभी जन्म-न लिया होता, तो वह पैदा होते ही, अपनी भूख शान्त करनेके लिए, माँके स्तनोंको खोज कर उनसे लग्न जाता। बालकने पहले अनेक जन्म लिये हैं और प्रत्येक बार माताओंके स्तन-पान किये हैं; इस बार भी उसे पहले जन्मकी बात याद है, उसे स्तन-पानका अनुभव है, दूध पीनेके लाभका