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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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ज्ञान है ; इसीसे वह इस जन्ममें, पैदा होते ही, बिना किसीके सिखाये, स्तन पीने लगता है। इससे साफ मालूम होता है कि हालके जन्मे वन्धेके मीतर चैतन्य वस्तु—आत्मा है और वह पहले जन्ममें भी था। उसी आत्माने अपना पहला शरीर छोड़ कर, इस नये शरीरमें प्रवेश किया है। उस बालकका पहला शरीर नाश हो गया है, पर उसके अन्दर रहनेवाला आत्मा ज्यों का त्यों है ; वह पुराने शरीरोंको त्याग-त्याग कर नये-नये शरीर धारण करता है। शरीर नाश होते जाते हैं, मगर आत्मा कभी नाश नहीं होता। इसीसे शास्त्रोंमें आत्माको अमर और अविनाशी तथा नित्य या सदा-सर्वदा रहनेवाला कहा है।

(८) प्रश्न—शरीर और आत्माका मुकाबला करो।

उ०—शरीरमें रहनेवाला आत्मा नित्य, अविनाशी, अक्षय, निराकार, निर्विकार, सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, अजर और अमर है ; किन्तु शरीर अनित्य, नाशमान्, घटने-बढ़नेवाला, साकार, विकारवान्, शूल और बूढ़ होने तथा मरनेवाला है।

आत्मा कभी मरता नहीं, सदा रहा आता है, इसीसे उसे नित्य कहते हैं। आत्माका कभी नाश नहीं होता, कोई भी उसका नाश नहीं कर सकता। मनुष्यकी तो बात ही क्या है, स्वयं जगदीश परम परमात्मा भी, आत्माका नाश नहीं कर सकता ; क्योंकि आत्मा स्वयं ही ब्रह्म है, कोई भी, अपना नाश आप नहीं कर सकता। आग आत्माको जला