वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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नहीं सकती, जल डुबा या गला नहीं सकता और हवा सुखा नहीं सकती ; अतः आत्माके अविनाशी होनेमें कोई सन्देह नहीं । आत्मा निराकार है ; यानी उसके आकार या अङ्ग प्रत्यङ्ग नहीं ; इसीलिये वह घटना-बहुता नहीं ; बस, इसी वजहसे उसे अक्षय भी कहते हैं । पैदा होना, अस्तित्व, बढ़ना, घटना, रूपान्तर होना और नाश होना—ये छः “भाव विकार” हैं । ये छः देहके धर्म हैं । शरीर पैदा होता है, घटना-बहुता है, शरीरमें ही जवानी और बुढ़ापा प्रभृति रूपान्तर या फेरफार होते हैं तथा शरीरका नाश होता है ; यानी शरीरको ये छः अवस्थाये होती हैं ; किन्तु आत्मा इन छहों विकारोंसे अलग रहता है । न वह पैदा होता है, न घटना-बहुता है, न उसमें रूपान्तर होते हैं और न उसका नाश होता है ; इसीसे उसे निर्विकार कहते हैं । आत्मा सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, इसलिये वह बुद्धि वगैरःसे जाना भी नहीं जा सकता । आत्मा न बूढ़ा होता है और न मरता है ; इसीसे उसे अजर और अमर कहते हैं ।
( ६ ) प्रश्न—क्या स्त्री और पुरुषमें आत्मा अलग-अलग होते हैं ?
जिस तरह बालकपन, जवानी और बुढ़ावस्वार्के शरीरमें एक ही आत्मा होता है ; उसी तरह स्त्री, पुरुष और नपुंसक प्रभृतिमें एकही आत्मा होता है । आत्मा जैसे-जैसे शरीरोंको धारण करता है ; वैसे-ही-वैसे हो जाता है । शरीर स्त्री या