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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४१० )

पुरुष होता है ; आत्मा नहीं । एक ही आत्मा दो तरहके शरीरोंमें रहनेसे स्त्री और पुरुष कहलाता है । स्त्रोंके शरीरमें रहनेवाला आत्मा, जब पुरुषके शरीरमें आ जाता है ; तब पुरुष कहलाता है और पुरुषके शरीरमें रहनेवाला आत्मा, जब स्त्रोंके शरीरमें आ जाता है ; तब स्त्री कहलाता है । आत्मा स्त्री पुरुष नहीं होता ; किन्तु शरीर स्त्री पुरुष होता है ।

( १० ) प्रश्न—मरनेके बाद इन्द्रियाँ अपना-अपना काम क्यों नहीं करती ?

उ०—शरीर जड़ है और आत्मा चेतन है । शरीर घर है और आत्मा दीपक है । जिस तरह घरमें दीपकका प्रकाश रहता है ; उसी तरह शरीर रूपी घरमें आत्मा रूपी दीपकका प्रकाश रहता है । यह चेतन आत्मा ही सारी इन्द्रियोंके गुणोंका प्रकाशक है । चेतन आत्माकी रोशनीसे ही इन्द्रियाँ अपना-अपना काम करती हैं । जब आत्मा शरीर-रूपी घरको छोड़ जाता है ; तब शरीर—घरमें अँधेरा हो जाता है । इन्द्रियाँ जो आत्माकी उद्योतिसे अपना-अपना काम करती थीं ; उसके शरीरमें न रहनेसे बे-काम हो जाती हैं ।

( ११ ) प्रश्न—क्या ईश्वर और आत्मा भिन्न-भिन्न हैं ?

उ०—नहीं ; ईश्वर और आत्मा बिल्कुल एक ही हैं । इनमें कुछ भेद नहीं ।

( १२ ) प्रश्न—ईश्वर सर्ववज्र और सर्वशक्तिमान् है ; पर