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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४६१ )

जीवात्मा तो सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् नहीं ; तब दोनों एक कैसे हुए ?

उ०—जीवात्माकी उपाधि अन्तः कारण है और ईश्वरकी उपाधि माया है। जीवात्माकी उपाधि छोटीसी है ; पर ईश्वर की उपाधि माया सारे ब्रह्माण्डमें फैल रही है ; इसीसे ईश्वर में सर्वज्ञता आदि धर्म रहते हैं ; पर जीवात्मामें नहीं। परन्तु सुखरुपता दोनोंमें समान है तथा नित्यत्व और चेतनत्व धर्म भी दोनोंमें बराबर हैं। इससे स्पष्ट है कि, ईश्वर और आत्मा में भेद नहीं ; उपाधिके छोटेपन और बड़ेपनके कारण दोनोंमें भेद जान पड़ता है।

यही सवाल किसी आदमीने एक महात्मासे किया था। महात्माने कहा—“मुझे प्यास जोरसे लगी है, अतः पहले गङ्गाजोसे एक तूम्बी जल भर लाओ।” वह आदमी एक तूम्बी गङ्गा-जल भर लाया और महात्माके सामने रख दिया। महात्माने कहा—“यह तो गङ्गाजल नहीं है। गङ्गाजलमें तो सेकड़ों नाव और अगन बोट आदि चलते हैं, बड़े बड़े मगर और घड़ियाल तथा मछलियाँ तैरती हैं, किनारे पर घाट बने हैं, लोग स्नान करते हैं ; पर इसमें तो इनमेंसे एक भी नहीं, फिर मैं इसे कैसे गङ्गाजल समझूँ ?” उस जल लाने वालेने कहा—“महाराज ! वह गङ्गाका बड़ा भारी प्रवाह है, जिसके किनारे पर्वत और वृक्षद्विक हैं तथा जिसमें जहाज चलते और मनुष्य नहाने हैं ; और यह उसी प्रवाहका एक छोटासा अंश है।