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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४२ )

इसमें वे सब कैसे रह सकते हैं ? पर इसके गङ्गा-जठ होनेमें जरा भी शक नहीं ; जो मधुरता आदि गुण उसमें हैं, वे ही सब इसमें भी हैं। यह सुनते ही महात्माने कहा—“वस, तेरा सवाल हल होगया। यही बात ईश्वरात्मा और जीवात्मामें है। दोनों एक ही हैं। ईश्वर नित्य और चेतन है ; आत्मा भी नित्य और चेतन है। वह सुख-रूप है और यह भी सुखरूप है। आत्माको उपाधि अन्तःकरण है और ईश्वरकी उपाधि माया है। आत्माकी उपाधि छोटीसी है, उसका दायरा छोटा है ; इसीसे आत्मामें सर्वज्ञता आदि नहीं ; पर ईश्वरकी उपाधि माया सारे विश्वमें व्याप रही है, उसका दायरा बहुत बड़ा है ; इसीसे उसमें सर्वज्ञता आदि धर्म हैं।

( १३ ) प्रश्न—क्या ईश्वर सर्वव्यापक है ? अगर ईश्वर सर्वज्ञ है, तो वह दीक्षता क्यों नहीं ?

उ०—जिस तरह दूधमें मक्खन, दहीमें घी, तिलोंमें तेल, पहाड़ी भरनोंमें जल और अरणीमें अश्विनी ज्योति है ; उसी तरह परमात्मा सर्वज्ञ है। जिस तरह तिलोंमें तेल है, पर दीक्षता नहीं ; दूधमें मक्खन है, पर दीक्षता नहीं ; ईधमें रस हैं, पर दीक्षता नहीं ; उसी तरह आत्मा सब शरीरोंमें है, पर दीक्षता नहीं।

( १४ ) प्र०—क्या सबमें एक ही आत्मा है ? अगर सबमें एक ही आत्मा है, तो अलग-अलग क्यों दीक्षता है ?

उ०—निश्चय ही सारे विश्वमें अथवा संसारके सभी