वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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इसमें वे सब कैसे रह सकते हैं ? पर इसके गङ्गा-जठ होनेमें जरा भी शक नहीं ; जो मधुरता आदि गुण उसमें हैं, वे ही सब इसमें भी हैं। यह सुनते ही महात्माने कहा—“वस, तेरा सवाल हल होगया। यही बात ईश्वरात्मा और जीवात्मामें है। दोनों एक ही हैं। ईश्वर नित्य और चेतन है ; आत्मा भी नित्य और चेतन है। वह सुख-रूप है और यह भी सुखरूप है। आत्माको उपाधि अन्तःकरण है और ईश्वरकी उपाधि माया है। आत्माकी उपाधि छोटीसी है, उसका दायरा छोटा है ; इसीसे आत्मामें सर्वज्ञता आदि नहीं ; पर ईश्वरकी उपाधि माया सारे विश्वमें व्याप रही है, उसका दायरा बहुत बड़ा है ; इसीसे उसमें सर्वज्ञता आदि धर्म हैं।
( १३ ) प्रश्न—क्या ईश्वर सर्वव्यापक है ? अगर ईश्वर सर्वज्ञ है, तो वह दीक्षता क्यों नहीं ?
उ०—जिस तरह दूधमें मक्खन, दहीमें घी, तिलोंमें तेल, पहाड़ी भरनोंमें जल और अरणीमें अश्विनी ज्योति है ; उसी तरह परमात्मा सर्वज्ञ है। जिस तरह तिलोंमें तेल है, पर दीक्षता नहीं ; दूधमें मक्खन है, पर दीक्षता नहीं ; ईधमें रस हैं, पर दीक्षता नहीं ; उसी तरह आत्मा सब शरीरोंमें है, पर दीक्षता नहीं।
( १४ ) प्र०—क्या सबमें एक ही आत्मा है ? अगर सबमें एक ही आत्मा है, तो अलग-अलग क्यों दीक्षता है ?
उ०—निश्चय ही सारे विश्वमें अथवा संसारके सभी
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शरीरोंमें एक ही आत्मा है। खी, पुख, गाय, भैंस, घोड़ा, गधा, हाथी, ऊँट, कुत्ता और बिल्ली प्रभृति संसारके सभी प्राणियोंमें एक ही आत्मा है। इन सबमें अलग-अलग आत्मा नहीं हैं; पर भ्रमवश या अज्ञानसे जिस तरह एक ही सूर्य अनेक जलसे भरे हुए घड़ोंमें अनेक सूर्योंकी तरह दीखता है। उसी तरह एक ही आत्मा अनेक शरीरों में अनेक आत्माओं की तरह दीखता है। बुद्धिमान् समझता है कि, सूरज एक है, पर अनेक घड़ोंमें अनेकों सूरजों की तरह दीखता है; उसी तरह ज्ञानी समझता है कि, सारे संसार में एक ही आत्मा व्याप रहा है; पर अनेकों शरीरों में अनेकों आत्माओं की तरह दीखता है।
(१५) प्र०—अगर जगत् के सभी शरीरोंमें एक ही आत्मा है, तो एक के सुखी होनेसे सभी सुखी क्यों नहीं होते और एक के दुखी होनेसे सभी दुखी क्यों नहीं होते और एक के मरनेसे सभी मर क्यों नहीं जाते इत्यादि ?
उ०—एक शरीरमें हाथ, पैर, नाक, कान अंगुली प्रभृति अनेक अवयव हैं, पर उस शरीरके सारे अवयवों में एक ही आत्मा है। इतने पर भी, पैरमें दर्द होनेसे हाथमें दर्द नहीं होता; नाकमें सुख होनेसे कानमें सुख नहीं होता और एक अङ्गके दूट जानेसे सारे अङ्ग दूट नहीं जाते। मतलब यह है कि जिस तरह एक शरीर के अवयवोंमें एक आत्मा होनेसे सबमें सुख-दुःख नहीं होता, उसी तरह ब्रह्माण्डके शरीरमें एक आत्मा
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हैं और संसारके सारे शरीर उसके अवयव हैं। एक शरीरके सुखी-दुखी होनेसे विराटके और शरीर सुखी-दुखी नहीं होते ; क्योंकि वे सब शरीर विराटके अवयव मात्र हैं। और भी खुलासा यों है कि, जिस तरह हमारे इस शरीरके हाथ पैर आदि अवयव हैं ; हमारे एक अवयव को कष्ट होनेसे दूसरे अवयव को कष्ट नहीं होता ; उसी तरह हम सारे ही प्राणी उस विराट-शरीरके अवयव हैं। हम में से एक के दुःखी होनेसे दूसरा दुःखी नहीं होता और सुखी होनेसे दूसरा सुखी नहीं होता।
आत्मासे सुख-दुःख आदिका कोई सम्बन्ध नहीं है। सुख-दुःख आदिका सम्बन्ध अन्तःकरण से है। गरमी-सरदी, सुख-दुःख आदि आत्माको नहीं मालूम होते ; किन्तु अन्तःकरणको मालूम होते हैं। सब अलग-अलग शरीरोंमें आत्मा तो एक ही है ; मगर अन्तःकरण अलग-अलग हैं। इसी कारण एक को सुख होनेसे सब को सुख और एक को दुःख होनेसे सबको दुःख नहीं होता। “एकोदेवः सर्वभूत्रेषु गृहः” इत्यादि श्रुतियोंसे साफ मालूम होता है कि, आत्मा सारे शरीरोंमें एक ही है। इच्छा संकल्प संशय, लज्जा, भय आदि मनसे सम्बन्ध रखते हैं। जी पेंसी समझते हैं कि, आत्माको सुख होता है, आत्मा को दुःख होता है तथा शरीर-शरीरमें अलग-अलग आत्मा हैं, वे सब भ्रूत करते हैं ; वे नादान और अज्ञानी हैं।
एक बात और है,—आत्मा नित्य और आदि-अन्त रहित है,
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उसका विनाश कभी नहीं होता, इसलिये आने वाले और जाने वाले, पैदा होनेवाले और नाश होनेवाले सुख-दुःखोंका सम्बन्ध आत्मासे नहीं हो सकता। दो समान पदार्थोंका सम्बन्ध होता है, यही नियम है। अन्तःकरण और सुख-दुःख आदि दोनों हो उत्पत्ति और विनाशमें समान हैं; अतः अन्तःकरण को ही दुःख-सुख मालूम होते हैं। निर्गुण, निराकार, नित्य और विकार-रहित आत्मा को अनित्य (सदा न रहने वाले) सुख-दुःख नहीं घेर सकते। सुख-दुःख अनित्य हैं और अन्तःकरण भी अनित्य है। अनित्यका अनित्यके साथ ही मेल हो सकता है; नित्य और अनित्य का संयोग कभी हो नहीं सकता। अब साफ तौरसे समझमें आ जायगा कि, सुख-दुःख का सम्बन्ध अन्तःकरण से है, आत्मा से उनका कुछ भी सरोकार नहीं। आत्माको कभी कोई दुःख नहीं होता। अज्ञान से आत्माका बन्धन मालूम होता है। अभिमानके कारण या विषयों और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे सुख-दुःख आदि पैदा होते हैं और वह अन्तःकरण को मालूम होते हैं; आत्माका उनसे कोई सरोकार नहीं। बस, यही वजह है कि सब शरीरमें एक आत्मा होने पर भी, अन्तःकरणोंके अलग होनेसे, एक को सुख होनेसे दूसरेको सुख और एक को दुःख होनेसे दूसरेको दुःख नहीं होता।
( १६ ) प्र०—मनुष्य बन्धन-मुक्त कैसे हो सकता है ?
• उ०—जिस तरह मरुभूमिमें भ्रमसे जल दीख पड़ता है, पर
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वास्तवमें वहाँ जलका नाम भी नहीं—मरुभूमि ही है ; उसी तरह यह जगत् जैसा दीखता है, वैसा नहीं है ; भ्रमसे वैसा दीखता है। असलमें मिथ्या प्रपञ्च है। यह मेरी स्त्री है, यह मेरा पुत्र है, यह मेरा धन है, यह मेरा घर है—यह सब वासना के खेल है ; यानी वासनासे ही संसार दीखता है। असलमें, न कोई किसीका पुत्र है और न पिता, न पुत्री। वासनाके कारण ही यह जीव बन्धनमें बँधता है। वासनाके कारण ही यह नाना प्रकारके कष्ट भोगता है। वासनाके त्यागसे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है और जीव ज्ञानी हो जाता है। हृदयमें कामनाओंका होना ही संसार है और कामनाओंका सब तरहसे नाश हो जाना ही मोक्ष है। जो बन्धनसे छूटना चाहें, वे वासना या कामना त्यागें।
( १७ ) प्र०—क्या पुत्र पौत्रोंके होनेसे गति हो जाती है ?
उ०—नहीं ; यह अज्ञानियोंका भ्रम है। पुत्र तो कुत्ते बिल्लो और सूअरोंके भी होते हैं, क्या उनकी गति हो जाती है ? हरगिज़ नहीं। पुत्रसे न तो किसीकी गति हुई और न होगी। गति अपने पुरुषार्थसे होती है। अगर पुत्रोंसे गति होती, तो पहलेके मोक्ष चाहनेवाले अपने पुत्रोंको क्यों त्याग जाते ? जो पुत्रसे गति होना मानते हैं, वे मोहान्ध हैं।
( १८ ) प्र०—क्या तीर्थयात्रसे भी मुक्ति नहीं हो सकती ?
उ०—जिन पुरुषोंके मन और बाणी आदि शुद्ध हैं, उनके यद-पदमें तीर्थ है ; किन्तु जिनके मन मलिन हैं, उनके लिये
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गङ्गा भी कीकट देशके समान है, यह बात "देवी भागवत"में कही है।
"कपिल गीता" में कहा है—यह तीर्थ है, वह तीर्थ है, ऐसा समझ कर अज्ञानी मारे-मारे फिरते हैं, क्योंकि उन्हें आत्मा रूपी तीर्थका हाल मालूम नहीं।
"गीता" में कहा है—जिसकी आत्मामें प्रोति है, जो आत्मानन्दसे तृप्त है या जो आत्मासे सन्तुष्ट है, उसे कुछ भी नहीं करना है; यानी उसके लिये तोर्थोंमें भटकने या और काम करनेकी जरूरत नहीं।
जिस तरह तालाबके निर्मल और ठहरे हुए जलमें सूर्यका बिम्ब-अक्षर—दीखता है; उसी तरह शुद्ध मन वालेको परमेश्वर दीखता है। जिसका मन स्थिर और शुद्ध है, उसके चरणोंमें तीर्थ हैं। किसीने कहा है—
दिल बदस्त आर्बुद कि हज्जे अकबर अस्त।
अज हजारों कांवा एक दिल बेहतर अस्त ॥
( १६ ) प्र०—महात्माओंने पुत्रोंको दुःखदायी और शत्रु क्यों कहा है ?
उ०—पुत्र सचमुच ही शत्रु होते हैं। पुत्र इस जन्म ही में माता-पिताको दुःखसे नहीं छुड़ा सकते, तब मरनेपर क्या सुखी करेंगे ? पुत्र तो केवल धनके साथी हैं। वे पूर्व जन्मके ठेनदार हैं। अपना ऋण चुकनेको पुत्ररूपमें जन्म छेते हैं। असलमें, पुत्रका नाम ही दुःखोंकी खानि है। जितने पुत्र नहीं होता, वे
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पराये पुत्रोंको देखकर मनमें कुड़-कुड़ कर मरते हैं। हाय ! हमारे धनका कौन मालिक होगा ? गुरीबोंको पुत्र न होनेसे इतना दुःख नहीं होता, जितना धनियोंको होता है। अगर किसीके पुत्र होकर घर जाता है, तो वह जीते जी ही मर जाता है। अगर पुत्रकी शादी हो जाती है और फिर वह मर जाता है, तो माता-पिताके जलनकी स्वीमा नहीं रहती ; पुत्र-बधूको देख-देख कर रात-दिन रोते-कलपते हैं। अगर पुत्र कुपुत्र निकल जाता है, तब तो माता-पिताको पद-पद पर जलना और कुड़ना पड़ता है। उनको पुत्र न होनेवालों से भी अधिक सन्ताप होता है। अगर पुत्र सुपुत्र होता है, तो उसके जीनेकी चिन्ता रहती है, फिर उसके शादी विवाह की फिक रहती है और औलाद हो जानेपर उसकी औलादकी चिन्ता रहती है। खारांश यह, पुत्रवानों को सदा चिन्ताश्रि में जलना पड़ता है और शेषमें पुत्रसे कोई लाभ भी नहीं। मरने पर पुत्र धनका मालिक हो जाता है और पिताका नाम भी नहीं लेता। अगर कोई श्राद्ध बगैरः करता है, तो वह अपने नाम और लोक-लाजको करता है ; पिताकी आत्माकी शान्तिके लिये नहीं करता। इसीसे तत्वज्ञानी लोग पुत्रकी इच्छा नहीं रखते और पुत्रको ऐसा शत्रु कहते हैं, जो ऊपर से मित्र मालूम होता है ; पर वास्तवमें पक्का शत्रु होता है। अनेक पुत्र दण्डित्वा पिताको मारते-पीटते हैं। उसे दहलीज में टूटीसी खाट पर पटक कर बासी-कूसी खाना देते और
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अनेक दुर्गति करते हैं। आश्चर्य है, फिर भी मोहान्म अज्ञानी पुत्र ही पुत्र चिह्नया करते हैं।
( २० ) प्र०—ज्ञान, ध्यान, ज्ञान और शौच किसे कहते हैं ?
उ०—आत्माको सब प्राणियोंमें एक रूपसे देखना ही "ज्ञान" है। मनका विषयोंसे रहित हो जाना ही "ध्यान" है। मनके मैलोंको दूर करना ही 'ज्ञान' है और इन्द्रियोंके निग्रह करने को ही "शौच" कहते हैं।
( २१ ) प्र०—संसार-बन्धनसे किस तरह छुटकारा मिल सकता है ?
उ०—विषयोंमें लगे हुए चित्तको, विषयोंसे हटाकर, ब्रह्म में लगा देनेसे संसार-बन्धनसे छुटकारा हो सकता है।
( २२ ) प्र०—आत्माके साक्षात्कारमें बाधक कौन है ? परमात्माका स्पष्ट दर्शन कब होता है ?
उ०—आँख, कान, नाक प्रभृति इन्द्रियाँ और रूप, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि विषय अन्तर्थाकी जड़ हैं। इन्द्रियाँ सदा विषयोंकी ओर पुरुषको ले जाती हैं और विषय विष की तरह घातक हैं। विषयासक्तोंको आत्मा या परमात्माका दर्शन नहीं होता।
विषय और इन्द्रियाँ पैदा होनेवाले और नाश होनेवाले हैं ; किन्तु आत्मा अजन्मा और अविनाशी है ; अतः उसका और इनका मेल नहीं, क्योंकि मेल समान-समानका होता है ; नाशमान और अविनाशीका मेल हो नहीं सकता। आत्मा इन
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से परे और सबका साक्षी है। उस आत्माकी प्राप्ति सत्यसे होती है। सत्यसे ही मनका निरोध होता है। मनका निरोध होते ही आत्मा साफ दीखता है ; यानी शुद्ध साफ और निर्मल मनमें ही आत्मा दीखता है, जिस तरह साफ दर्पणमें चेहरा दीखता है। अशुद्ध मनमें आत्मा नहीं दीखता। अशुद्ध मन बन्धनका कारण और शुद्ध मन मोक्षका कारण है। मनके शुद्ध हो जानेसे चुरे भले कर्मोंका नाश हो जाता है। कर्मोंके नाश हो जानेसे पुरुष जीवन्मुक्त हो जाता है। मतलब यह है कि, आत्मा या परमात्माके दर्शन चाहनेवालोंको, इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर, मनको शुद्ध करना जरूरी है। जिस तरह लकड़ियोंके न रहनेसे अग्नि अपने कारणमें लय हो जाती है ; यानी बुझ जाती है ; उसी तरह वृत्तियोंसे रहित हुआ मन भी अपने कारणमें लय हो जाता है ; यानी शान्त हो जाता है। जब मन शान्त हो जाता है, उसको चञ्चलता नाश हो जाती है, वह स्थिर हो जाता है ; तब आत्माका दर्शन होने लगता है। जिस तरह चञ्चल हवासे हिलते हुए मैठे गवले जलमें सूरजका विम्ब या अक्स नहीं दीखता ; उसी तरह अशुद्ध, मैठे और चञ्चल चित्तमें आत्मा नहीं दीखता। अतः मनकी चञ्चलता और उसकी गन्दीगो की दूर करना जरूरी है।
( २३ ) प्रश्न—परमेश्वर कहाँ है ? उसका ध्यान कैसे करना चाहिए ?
उ०—यह जो हमारा शरीर है, यही उस देवता—परमेश्वर
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के रहनेका मन्दिर है। इसीमें जो चेतन जीव है, वही केवल “शिव” है। मनुष्यको हृदय-कमलमें परमेश्वरका ध्यान करना चाहिए। चञ्चल या चलायमान चित्तसे वह नहीं दीखता है।
( २४ ) प्रश्न—सारे दुःखोंका मूल कारण क्या है ?
उ०—तृष्णा—इच्छा। जिसके मनमें तृष्णा है, उसका मन सदा इधर-उधर भटकता रहता है, वह कभी शान्त नहीं होता। मनके शान्त हुए बिना प्राणीको सुख नहीं ; अतः तृष्णाको त्यागना चाहिए ; किसी भी वस्तुकी इच्छा न रखनी चाहिए। यहाँतक कि, स्वर्ग और मोक्षकी भी इच्छा न रखनी चाहिए।
( २५ ) प्रश्न—अगर यह जगत् जड़ है, तो यह चेष्टा कैसे करता है ?
उ०—वेशक यह जगत् जड़, नाशमान और दुःख-रूप है ; किन्तु ब्रह्म चेतन, नित्य और सुख-रूप है। जिस तरह बुम्बक पत्थरकी विलक्षण शक्तिसे लोहा चेष्टा करने लगता है ; उसी तरह ब्रह्मचेतन की विलक्षण शक्तिसे यह जगत् भी चेष्टा करता है।
( २६ ) प्र०—ईश्वर और जीव की एकता प्रमाणित् कुम्भो ।
उ०—ईश्वर और जीवमें भेद नहीं है। जैसे ब्रह्म निरवयव है और निराकार है ; वैसे ही जीव भी निरवयव और निराकार है। एक ही चेतन अन्तःकरण रूपी उपाधिोंके अन्तर्गत तो
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जिन्दगी भी सदा नहीं रहती। मनुष्य पानीके बुल-बुलेको तरह पैदा होता और सड़ ही बिलाय जाता है। धन और प्रभुता भी सदा नहीं रहते। जो आज राजा है, कल वह फ़कीर हो जाता और दरदर मारा-मारा फिरता है। अतः इन पर फूटना—अभिमान करना, अज्ञानियोंका काम है।
(३२) प्र०—मनुष्यका सबसे बड़ा कर्तव्य—फ़र्ज़ क्या है ?
उ०—ईश्वर-भजन करना ; क्योंकि वह स्वामी है। स्वामी ध्यान दे, चाहे न दे ; पर सेवक को अपने कर्तव्य-पालन या फ़र्ज़ अदा करनेमें न चूकना चाहिए। जो उग्र विषय-भोगोंमें लुंधा बीत गई सो बीत गई ; पर जो वाकी रही है, उसका क्षण-क्षण परमात्माके भजनमें लगाना चाहिए, क्योंकि कौन जाने यह श्वास बाहर निकल कर भीतर न आवे।
किसीने कहा है :—
अरे भज हरेनाम क्रेमधाम कृणे—कृणे । वहिसरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्तने ॥
अरे जीव ! हरिके नामको क्षण-क्षण भज, हरिका नाम कल्याण का घर है। जो श्वास बाहर चला जाता है, उसके भीतर आनेका कौन विश्वास ? आवे और न आवे।
ऐसी ही बात कबीरदासने कही है :—
नव द्वारेका पींजरा, तामें पंखी पौन । रहने का आश्चर्य है, गमे अचम्मा कौन ॥
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मनुष्य शरीर नौ दरवाजोंका पींजरा है। इसमें दो दरवाजे हैं, दो आँखोंमें, दो नाकमें, दो कानोंमें, एक मुँहमें, एक गुदमें और एक गुप्त इन्द्रियमें। इस तरह नौ द्वार हैं। इसी नौ द्वारके पींजरमें पवन-रूपी पक्षी—जीव रहता है। इतने द्वार होने पर भी, वह इस पींजरे में रहता है, यही आश्चर्य की बात है। इतने द्वारोंसे निकल जानेमें क्या आश्चर्य? तात्पर्य यह कि, जीव न जाने कब इस शरीरको छोड़ भागे। जब तक जीव इस शरीरमें है, तभी तक हरि-भजन या मोक्ष लाभ करनेकी तदबीरें की जा सकती हैं। जीवके इस शरीरसे निकल भागनेके बाद, यह मौका हाथसे निकल जायगा। जीव इस शरीरको त्यागते ही कीड़े, मकोड़े, साँप, छहूँ दर, बिल्लो, कुत्ते, गवे, घोड़े प्रभृतिकी योनियें जन्म ले लेगा। उन योनियोंमें ज्ञान-शक्ति नहीं होती; अतः उन शरीरोंमें जाकर मोक्ष-लाभ हो नहीं सकता। मनुष्य-शरीरसे ही मोक्ष मिल सकती है, पर मनुष्य-शरीर बार बार नहीं मिलता। ८४ लाख योनियाँ भुगत लेने पर मनुष्य-जन्म मिलता है; अतः इस सुअवसरको हाथसे गँवाना भारी अज्ञानता है। जो इसमें चूकेगा, लाखों-करोड़ों वर्ष तक पछतावेगा अतः जब तक जीवन है, मनको सब ओर-से शोक कर, विषयोंको विषवत् त्याग कर, हरिका भजन करो।
( ३३ ) प्र०—दैराग्य पैदा होने और पापोंसे बचनेका मूल कारण क्या है?
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३०—मृत्युको याद रखना। मौतको याद रखनेसे पाप नहीं होते और वैराग्य उत्पन्न होता है। श्मशान-घाट पर जानेसे ही मनुष्यके बित्तमें वैराग्य उत्पन्न हो उठता है, पर वह घर आकर सब भूल जाता है, फिर विषयोंमें लग जाता है। एक बादशाहने पाप और अन्यायसे बचनेके लिये ही अपने दरबारमें, सामने ही, एक कूब्र बनवा रखी थी, कि कूब्रको देखते रहनेसे मुझसे अन्याय-कर्म न होंगे। मृत्यु अटल है। और सब टल जायँ, पर मृत्यु टल नहीं सकती, वह अवश्य आवेगी; चाहे आज आवे और चाहे कल। जिसने जन्म लिया है, उसे मरना ही होगा। जो मरनेकी बात भूल जाते हैं, जिन्हें यह याद नहीं रहता कि, हम दो दिन या दश दिनमें मरेंगे, वही पाप-कर्म करते हैं और उन्हें ही संसारसे विरक्ति नहीं होती। जिनको हर क्षण मौत दीखती है, उनका मन विषय-भोगों या स्त्री-पुत्र धन-दौलत प्रभृतिमें नहीं लगता। संसारसे मनके हटनेका ही नाम "वैराग्य" है।
( ३४ ) प्र०—कौन किसीका भी बुरा नहीं चाहता ?
३०—जो वैराग्यवान है, जिसे संसारकी असलियतका पता है, जिसे अपने जीवनका क्षण-मरका भी भरोसा नहीं है, जो धन-यौवन, शरीर और भोगोंको नाशमान् समझता है, जो सबके अन्दर एक चेतन आत्माको देखता है, वह भूल कर भी किसीका बुरा नहीं चाहता।
( ३५ ) प्र०—दुःखाँ और सुखाँका हेतु क्या है ?
( ५०७ )
३०—संसारके भोगोंमें राग ही दुःखोंका और इनमें वैराग्य ही सुखोंका कारण है। दूसरे शब्दोंमें यों समझिये—जो संसारमें ममता रखता है, वह नाना प्रकारके दुःख भोगता है और जो संसारमें ममता नहीं रखता, संसारको त्याग देता है, वह परम सुख पाता है। वैराग्यके सिवा, संसारमें और कहीं सुख है ही नहीं, यह निश्चय है।
( ३६ ) प्र०—राग और वैराग्यका क्या कारण है ?
३०—विषयोंमें सुख मालूम होना ही रागका कारण है और इनमें दुःख मालूम होना ही वैराग्य का कारण है। जब मनुष्य धन और स्त्री पुत्र आदिसे सुखी होता है, तभी उसे इन सबमें राग या प्रीति होती है ; पर जब उसे इनसे दुःख होता है, तब उसे वैराग्य होता है। किसीको स्त्री खूब प्यार करती है, उसे अच्छी तरह आलिङ्गन करती है, उसको सेवामें हरदम खड़ी रहती है, उसके सिवा और किसी पुरुषको नहीं चाहती, तब मनुष्यका मन स्त्रीमें और भी फँसता है,—वही राग है। पर यदि स्त्री पुरुषको प्यार नहीं करती, उसके घरमें आते ही कलह करती है, कड़े शब्द कहती है, हर तरह तंग करती है, मीठी बातें नहीं बोलती, पर-पुरुषको चाहती है ; तब उसका मन स्त्रीसे हट जाता है, वह उसे बुढ़ी-मालूम होती है, अतः उसे वैराग्य हो जाता है। महाराजा भर्तृहरिको जबतक यह मालूम था कि, पिंगला मुझे खूब चाहती है, अष्ट बहर मेरा ही भजन करती है, तब तक उनका मन उसीमें फँसा
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रहा ; लेकिन ज्योंही उन्हें मालूम हुआ कि, वह पर-पुरुषरता है ; यह कुलटा है और अश्वपालसे प्रीति रखती है, उन्हें संसारसे विरक्ति हो गई। वे राजपाट धन-दौलत सबको त्याग संन्यासी हो गये।
( ३७ ) प्र०—क्या गृहस्थाश्रममें वैराग्य हो सकता है ?
उ०—सबकी पैदायश ही गृहस्थाश्रमसे है। गृहस्थीमें सदा सुख ही रहे, ऐसा हो नहीं सकता। इसमें एक-न-एक दुःख बना ही रहता है। कभी लड़का मरता है, कभी स्त्री मरती है, कभी धन नाश हो जाता है, कभी ऋण-भार सिर पर चढ़ता है, कभी शत्रु सताते हैं ; अतः मनुष्यको जरा-बहुत वैराग्य होता ही रहता है ; पर यह मन्द वैराग्य होता है। जब मनुष्य पर कष्ट आता है, उसे वैराग्य होता है ; पर ज्योंही दुःख टल कर सुखकी बड़ी आती है, उसका वैराग्य नहीं रहता पर वैराग्यका मूल कारण है गृहस्थाश्रम ही। रामचन्द्रजी और वशिष्ठजी प्रभृति महापुरुषोंको गृहस्थीमें ही वैराग्य हुआ था। जनक प्रभृतिको गृहस्थाश्रममें ही ज्ञान हुआ था। जनक महा-राज गृहस्थीमें रहकर भी सच्चे त्यागी थे और उन्हें लोग विदेह कहते थे। ज्ञानका कारण वैराग्य है। जिसे गृहस्थाश्रममें वैराग्य है, वह ज्ञानी है ; पर जिसे संन्यासाश्रममें भी राग है, वह अज्ञानी है। खूब याद रक्खो, बिना वैराग्य ज्ञान नहीं होता और बिना ज्ञानके मोक्ष नहीं होती। जो मनुष्य गृहस्थीमें रहकर भी उसमें कमलको तरह रहता है, उसकी
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मुक्ति हो जाती है। यद्यपि कमल जलमें रहता है, पर पानी उस पर नहीं ठहरता; इसी तरह जो गृहस्थीमें रहता है, गृहस्थीके सब काम विषय-भोगादि करता है; पर उनमें ममता या आसक्ति नहीं रखता, वह जीवन्मुक्त है। राजा जनक, गृहस्थीमें रहकर क्या नहीं करते थे? पर उनकी आसक्ति या ममता किसी भी पदार्थमें नहीं थी।
( ३८ ) प्र०—संसारमें कौन है और पुरुष कौन है?
उ०—जो पुरुष अपने हृदयमें रहनेवाले पुरुषरूप स्वप्रकाश आनन्द-रूप आत्माको नहीं जानता, वह कौ है; क्योंकि जैसे स्त्रीका पति उससे अलग होता है; उसी तरह उस आत्माको न जाननेवालेने भी अपनेसे अलग पति मान रक्खा है। मतलब यह, जिसमें वैराग्य और आत्म-विचार नहीं, वह स्त्री है।
( ३९ ) प्रश्न—ईश्वरके भजन-स्मरणमें वैराग्यकी क्या ज़रूरत है।
उ०—बिना वैराग्यके पुरुषका मन ईश्वर-भजनमें नहीं लगता, इसलिये वैराग्यकी ज़रूरत है। मन एक है। जब तक वह विषय-भोगोंमें लगा रहता है, तब तक वह ईश्वरमें नहीं लग सकता; लेकिन जब वह विषय-भोगोंसे हट जाता है, तब वह ईश्वरमें लग जाता है। जब मनमें विषय-भोगोंकी भाव-बनी रहती है, जब यह विषय-भोगोंकी लाटलासे भरा रहता है, तब उसमें ईश्वरके लिये जगह नहीं रहता; लेकिन जब वह विषय-भोगोंसे खाली हो जाता है; यही शुद्ध और साफ हो
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जाता है; तब उस निर्मल और खाली मनमें परमेश्वर बैठ सकता है। अतः परमेश्वरके दर्शन चाहनेवालेको पहले वैराग्य द्वारा अपना मन शुद्ध करना चाहिए।
( ४० ) प्रश्न—संसारमें सर्पसे भी भयङ्कर कौन है?
४०—स्त्री सर्प भी से भयंकर है। सर्पके विषसे मनुष्य एक बार ही मरता है; पर स्त्रीके विषसे बार-बार मरता है; यानी वासना बनी रहनेसे, वह बार-बार जन्म लेता और मरता है।
( ४१ ) प्रश्न—स्त्री-रूपी सर्पके विषसे बचनेका क्या उपाय है?
४०—स्त्रीकी याद न करना और उसे कभी न देखना। उसकी छायासे भी दूर रहना।
( ४२ ) प्र०—स्त्री-सङ्गसे क्या हानि है?
४०—जिसमें जिसकी वासना रहती है, वह स्वप्नमें भी दीखता है; इसी तरह मरण-कालमें जब पुख्णकी वासना स्त्रीमें रहती है; तब उसको प्रात करनेके लिये वह फिर शरीर धारण करता है। मरते समय विशेष कर स्त्रीमें मन रहता ही है। इससे ज्ञानी लोग पहले ही स्त्रीसे अलग हो जाते हैं; जिससे मरण-कालमें उसमें वासना न रहे। इसके सिवा कामी पुख्ण और स्त्रियोंके सङ्गसे पुख्ण कामी हो जाता है और दूसरा जन्म लेनेपर क्रोधी और मोही होता है। काम क्रोध और मोह प्रभृतिसे मन अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध मनमें
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ब्रह्मज्ञान नहीं उद्भवता । जो मनुष्य ब्रह्मज्ञान-शून्य होता है ; वह कीड़े मकोड़ोंकी योनि पाता है । इन शरीरोंको पाकर फिर वह नरकसे नहीं निकल सकता ; इसलिये स्त्रियोंका सङ्ग नहीं करना चाहिये ।
( ४३ ) प्र०—सच्चा ज्ञानी कैसा होता है ?
उ०—जिसका किसी पदार्थमें राग न हो, यहाँ तक कि स्त्री पुत्र प्रभृतिमें भी राग न हो । अगर संन्यासी हो तो मठ, खेलों और धन प्रभृतिमें राग न हो, शत्रु-मित्र आदि सब जीवोंको एक नज़रसे देखे-किसीको अपना और किसीको पराया न समझे ; किसीको भी जिससे भय न हो और किसीसे भी जिसे भय न हो ; जो आत्माको असर और अविनाशी तथा शरीरसे अलग समझता हो ; जो सब प्राणियोंमें एक आत्मा-को देखता हो ; जो ईश्वर और जीवमें भेद न समझता हो ; जो नष्ट हुए, मरे और बीतों बातका शोक न करता हो, यानी सर्वस्व नाश हो जाने और पुत्र तथा स्त्री तकके मर जाने पर भी, नाम मात्रको भी रक्ष न करता हो, वही सच्चा ज्ञानी है । किन्तु जो ज्ञानीकी सी वार्ते तो वधारता ही पर वैराग्यसे शून्य हो, वह बन्ध्यज्ञानी है ।
( ४४ ) प्र०—चित्तकी शुद्धिका साधन क्या है ।
उ०—शुद्ध अन्न ।
( ४५ ) प्र०—शुद्ध अन्न कैसा होता है ?
• उ०—जो सत्य धर्मसे कंमाया जाता है, वही शुद्ध द्रव्य
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होता है। उस शुद्ध दृश्यसे जो खाने पीनेके पदार्थ खरीदे जाते हैं, वही शुद्ध कहे जाते हैं। वैसे शुद्ध पदार्थोंके खानेसे मन शुद्ध हो जाता है ; क्योंकि अन्नके द्वारा सत्य-धर्मका असर चित्त पर भी होता है। शुद्ध चित्तमें ही वैराग्य और विवेक आदि पैदा होते हैं। असलमें सत्य बोलना सर्वोपरि है। सत्यसे योही चित्त शुद्ध हो जाता है और इससे अन्न भी शुद्ध होता है ; इसलिये हमेशा सत्यके आश्रय रहो ; सत्यको न त्यागो। सत्यके समान जगत्में कोई दूसरा धर्म या भक्ति-उपासना नहीं है।
( ४६ ) प्र०—चोर और दुष्टोंको भी साधु बनाने वाला क्या है ?
उ०—“सत्सङ्ग ।” सत्सङ्गकी महिमा शेष शारदा भी नहीं गा सकती। कमल पर स्थित जलकी बूँद भी मोती-जैसी लगती है। लोहा काठके सङ्गमें रहनेसे जलमें नहीं डूबता। नदी-नालोंका जल भी गङ्गाजलके सङ्ग मिल कर गङ्गाजल हो जाता है। नागरपानके सङ्ग ढाकका पत्ता भी राजा तक पहुँच जाता है। चींटी फूलमें बैठकर महादेवजीके सिर पर चढ़ जाती है। चन्दनके साथ नीम भी चन्दन हो जाता है। पारस-एश्वरको छू जानेसे लोहा कुन्दन हो जाता है। बाँस मिश्रीके साथ मिलकर उसीके साथ तुलता है। सत्सङ्गसे ही घोर बनमें जाकर डाकूपना करनेवाले भोल बाबूजीकीजिगी महषि हो गये ; अतः सत्सङ्गको चित्तकी शुद्धिका मुख्य उपाय
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समझना चाहिए, और कुशलसे बचना चाहिए। क्योंकि उस से चित्त अशुद्ध हो जाता है।
( ४७ ) प्र०—क्या चित्तकी शुद्धिका और भी कोई उपाय है ?
उ०—हाँ, परोपकार या दूसरों पर दया करने से भी चित्त शुद्ध हो जाता है। दयालुचित्त मनुष्य ही दूसरोंका भला करते हैं। असलमें चित्त-शुद्धिका “दया” मुख्य साधन है। जो मनुष्य-शरीर पाकर उपकार नहीं करता, वह पशुओंसे भी गया-बीता है। ईश्वरने मनुष्य-शरीर परोपकारके लिये ही दिया है। शास्त्रोंमें लिखा है—“धन और प्राणोंसे परोपकार करना चाहिये ; क्योंकि परोपकारके बराबर सौ यज्ञोंका भी पुण्य नहीं है। जो परोपकारहीन है, उसका जीना वृथा है। जानवरोंका चमड़ा भी पराये काम आता है। अपने लिये कौन नहीं जीता ? जो पराये लिये जीता है, वही जीता है। वृक्ष अपने लिये फल नहीं देते, नदियाँ अपने लिये नहीं बहतीं, शेषजीने पृथ्वी परोपकारके लिये ही अपने खिर पर धर रखी है। भगवान् कृष्ण पराये कामके लिये ही सारथी बने थे। सन्त लोग परोपकारके लिये ही शरीर धारण करते हैं ; अतः मनुष्यका सबसे बड़ा कर्तव्य परोपकार या दया करना है। इससे चित्त शुद्ध हो जाता है और शुद्ध चित्तमें परमात्माके दर्शन हो जाते हैं।
• ( ४८ ) प्रश्न—ज्ञानवानकी नज़रमें सबमें एक ही आत्मा
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