वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
पृष्ठ 617, कुल 648 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४६७ )
गङ्गा भी कीकट देशके समान है, यह बात "देवी भागवत"में कही है।
"कपिल गीता" में कहा है—यह तीर्थ है, वह तीर्थ है, ऐसा समझ कर अज्ञानी मारे-मारे फिरते हैं, क्योंकि उन्हें आत्मा रूपी तीर्थका हाल मालूम नहीं।
"गीता" में कहा है—जिसकी आत्मामें प्रोति है, जो आत्मानन्दसे तृप्त है या जो आत्मासे सन्तुष्ट है, उसे कुछ भी नहीं करना है; यानी उसके लिये तोर्थोंमें भटकने या और काम करनेकी जरूरत नहीं।
जिस तरह तालाबके निर्मल और ठहरे हुए जलमें सूर्यका बिम्ब-अक्षर—दीखता है; उसी तरह शुद्ध मन वालेको परमेश्वर दीखता है। जिसका मन स्थिर और शुद्ध है, उसके चरणोंमें तीर्थ हैं। किसीने कहा है—
दिल बदस्त आर्बुद कि हज्जे अकबर अस्त।
अज हजारों कांवा एक दिल बेहतर अस्त ॥
( १६ ) प्र०—महात्माओंने पुत्रोंको दुःखदायी और शत्रु क्यों कहा है ?
उ०—पुत्र सचमुच ही शत्रु होते हैं। पुत्र इस जन्म ही में माता-पिताको दुःखसे नहीं छुड़ा सकते, तब मरनेपर क्या सुखी करेंगे ? पुत्र तो केवल धनके साथी हैं। वे पूर्व जन्मके ठेनदार हैं। अपना ऋण चुकनेको पुत्ररूपमें जन्म छेते हैं। असलमें, पुत्रका नाम ही दुःखोंकी खानि है। जितने पुत्र नहीं होता, वे
३२