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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४६६ )

वास्तवमें वहाँ जलका नाम भी नहीं—मरुभूमि ही है ; उसी तरह यह जगत् जैसा दीखता है, वैसा नहीं है ; भ्रमसे वैसा दीखता है। असलमें मिथ्या प्रपञ्च है। यह मेरी स्त्री है, यह मेरा पुत्र है, यह मेरा धन है, यह मेरा घर है—यह सब वासना के खेल है ; यानी वासनासे ही संसार दीखता है। असलमें, न कोई किसीका पुत्र है और न पिता, न पुत्री। वासनाके कारण ही यह जीव बन्धनमें बँधता है। वासनाके कारण ही यह नाना प्रकारके कष्ट भोगता है। वासनाके त्यागसे ही परमानन्दकी प्राप्ति होती है और जीव ज्ञानी हो जाता है। हृदयमें कामनाओंका होना ही संसार है और कामनाओंका सब तरहसे नाश हो जाना ही मोक्ष है। जो बन्धनसे छूटना चाहें, वे वासना या कामना त्यागें।

( १७ ) प्र०—क्या पुत्र पौत्रोंके होनेसे गति हो जाती है ?

उ०—नहीं ; यह अज्ञानियोंका भ्रम है। पुत्र तो कुत्ते बिल्लो और सूअरोंके भी होते हैं, क्या उनकी गति हो जाती है ? हरगिज़ नहीं। पुत्रसे न तो किसीकी गति हुई और न होगी। गति अपने पुरुषार्थसे होती है। अगर पुत्रोंसे गति होती, तो पहलेके मोक्ष चाहनेवाले अपने पुत्रोंको क्यों त्याग जाते ? जो पुत्रसे गति होना मानते हैं, वे मोहान्ध हैं।

( १८ ) प्र०—क्या तीर्थयात्रसे भी मुक्ति नहीं हो सकती ?

उ०—जिन पुरुषोंके मन और बाणी आदि शुद्ध हैं, उनके यद-पदमें तीर्थ है ; किन्तु जिनके मन मलिन हैं, उनके लिये