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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४६५ )

उसका विनाश कभी नहीं होता, इसलिये आने वाले और जाने वाले, पैदा होनेवाले और नाश होनेवाले सुख-दुःखोंका सम्बन्ध आत्मासे नहीं हो सकता। दो समान पदार्थोंका सम्बन्ध होता है, यही नियम है। अन्तःकरण और सुख-दुःख आदि दोनों हो उत्पत्ति और विनाशमें समान हैं; अतः अन्तःकरण को ही दुःख-सुख मालूम होते हैं। निर्गुण, निराकार, नित्य और विकार-रहित आत्मा को अनित्य (सदा न रहने वाले) सुख-दुःख नहीं घेर सकते। सुख-दुःख अनित्य हैं और अन्तःकरण भी अनित्य है। अनित्यका अनित्यके साथ ही मेल हो सकता है; नित्य और अनित्य का संयोग कभी हो नहीं सकता। अब साफ तौरसे समझमें आ जायगा कि, सुख-दुःख का सम्बन्ध अन्तःकरण से है, आत्मा से उनका कुछ भी सरोकार नहीं। आत्माको कभी कोई दुःख नहीं होता। अज्ञान से आत्माका बन्धन मालूम होता है। अभिमानके कारण या विषयों और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे सुख-दुःख आदि पैदा होते हैं और वह अन्तःकरण को मालूम होते हैं; आत्माका उनसे कोई सरोकार नहीं। बस, यही वजह है कि सब शरीरमें एक आत्मा होने पर भी, अन्तःकरणोंके अलग होनेसे, एक को सुख होनेसे दूसरेको सुख और एक को दुःख होनेसे दूसरेको दुःख नहीं होता।

( १६ ) प्र०—मनुष्य बन्धन-मुक्त कैसे हो सकता है ?

• उ०—जिस तरह मरुभूमिमें भ्रमसे जल दीख पड़ता है, पर