वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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हैं और संसारके सारे शरीर उसके अवयव हैं। एक शरीरके सुखी-दुखी होनेसे विराटके और शरीर सुखी-दुखी नहीं होते ; क्योंकि वे सब शरीर विराटके अवयव मात्र हैं। और भी खुलासा यों है कि, जिस तरह हमारे इस शरीरके हाथ पैर आदि अवयव हैं ; हमारे एक अवयव को कष्ट होनेसे दूसरे अवयव को कष्ट नहीं होता ; उसी तरह हम सारे ही प्राणी उस विराट-शरीरके अवयव हैं। हम में से एक के दुःखी होनेसे दूसरा दुःखी नहीं होता और सुखी होनेसे दूसरा सुखी नहीं होता।
आत्मासे सुख-दुःख आदिका कोई सम्बन्ध नहीं है। सुख-दुःख आदिका सम्बन्ध अन्तःकरण से है। गरमी-सरदी, सुख-दुःख आदि आत्माको नहीं मालूम होते ; किन्तु अन्तःकरणको मालूम होते हैं। सब अलग-अलग शरीरोंमें आत्मा तो एक ही है ; मगर अन्तःकरण अलग-अलग हैं। इसी कारण एक को सुख होनेसे सब को सुख और एक को दुःख होनेसे सबको दुःख नहीं होता। “एकोदेवः सर्वभूत्रेषु गृहः” इत्यादि श्रुतियोंसे साफ मालूम होता है कि, आत्मा सारे शरीरोंमें एक ही है। इच्छा संकल्प संशय, लज्जा, भय आदि मनसे सम्बन्ध रखते हैं। जी पेंसी समझते हैं कि, आत्माको सुख होता है, आत्मा को दुःख होता है तथा शरीर-शरीरमें अलग-अलग आत्मा हैं, वे सब भ्रूत करते हैं ; वे नादान और अज्ञानी हैं।
एक बात और है,—आत्मा नित्य और आदि-अन्त रहित है,