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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ४६३ )

शरीरोंमें एक ही आत्मा है। खी, पुख, गाय, भैंस, घोड़ा, गधा, हाथी, ऊँट, कुत्ता और बिल्ली प्रभृति संसारके सभी प्राणियोंमें एक ही आत्मा है। इन सबमें अलग-अलग आत्मा नहीं हैं; पर भ्रमवश या अज्ञानसे जिस तरह एक ही सूर्य अनेक जलसे भरे हुए घड़ोंमें अनेक सूर्योंकी तरह दीखता है। उसी तरह एक ही आत्मा अनेक शरीरों में अनेक आत्माओं की तरह दीखता है। बुद्धिमान् समझता है कि, सूरज एक है, पर अनेक घड़ोंमें अनेकों सूरजों की तरह दीखता है; उसी तरह ज्ञानी समझता है कि, सारे संसार में एक ही आत्मा व्याप रहा है; पर अनेकों शरीरों में अनेकों आत्माओं की तरह दीखता है।

(१५) प्र०—अगर जगत् के सभी शरीरोंमें एक ही आत्मा है, तो एक के सुखी होनेसे सभी सुखी क्यों नहीं होते और एक के दुखी होनेसे सभी दुखी क्यों नहीं होते और एक के मरनेसे सभी मर क्यों नहीं जाते इत्यादि ?

उ०—एक शरीरमें हाथ, पैर, नाक, कान अंगुली प्रभृति अनेक अवयव हैं, पर उस शरीरके सारे अवयवों में एक ही आत्मा है। इतने पर भी, पैरमें दर्द होनेसे हाथमें दर्द नहीं होता; नाकमें सुख होनेसे कानमें सुख नहीं होता और एक अङ्गके दूट जानेसे सारे अङ्ग दूट नहीं जाते। मतलब यह है कि जिस तरह एक शरीर के अवयवोंमें एक आत्मा होनेसे सबमें सुख-दुःख नहीं होता, उसी तरह ब्रह्माण्डके शरीरमें एक आत्मा