सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 618, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 618

( ४६८ )

पराये पुत्रोंको देखकर मनमें कुड़-कुड़ कर मरते हैं। हाय ! हमारे धनका कौन मालिक होगा ? गुरीबोंको पुत्र न होनेसे इतना दुःख नहीं होता, जितना धनियोंको होता है। अगर किसीके पुत्र होकर घर जाता है, तो वह जीते जी ही मर जाता है। अगर पुत्रकी शादी हो जाती है और फिर वह मर जाता है, तो माता-पिताके जलनकी स्वीमा नहीं रहती ; पुत्र-बधूको देख-देख कर रात-दिन रोते-कलपते हैं। अगर पुत्र कुपुत्र निकल जाता है, तब तो माता-पिताको पद-पद पर जलना और कुड़ना पड़ता है। उनको पुत्र न होनेवालों से भी अधिक सन्ताप होता है। अगर पुत्र सुपुत्र होता है, तो उसके जीनेकी चिन्ता रहती है, फिर उसके शादी विवाह की फिक रहती है और औलाद हो जानेपर उसकी औलादकी चिन्ता रहती है। खारांश यह, पुत्रवानों को सदा चिन्ताश्रि में जलना पड़ता है और शेषमें पुत्रसे कोई लाभ भी नहीं। मरने पर पुत्र धनका मालिक हो जाता है और पिताका नाम भी नहीं लेता। अगर कोई श्राद्ध बगैरः करता है, तो वह अपने नाम और लोक-लाजको करता है ; पिताकी आत्माकी शान्तिके लिये नहीं करता। इसीसे तत्वज्ञानी लोग पुत्रकी इच्छा नहीं रखते और पुत्रको ऐसा शत्रु कहते हैं, जो ऊपर से मित्र मालूम होता है ; पर वास्तवमें पक्का शत्रु होता है। अनेक पुत्र दण्डित्वा पिताको मारते-पीटते हैं। उसे दहलीज में टूटीसी खाट पर पटक कर बासी-कूसी खाना देते और

वैराग्य शतक · पृष्ठ 618, कुल 648 में से · BharatKosha