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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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अनेक दुर्गति करते हैं। आश्चर्य है, फिर भी मोहान्म अज्ञानी पुत्र ही पुत्र चिह्नया करते हैं।

( २० ) प्र०—ज्ञान, ध्यान, ज्ञान और शौच किसे कहते हैं ?

उ०—आत्माको सब प्राणियोंमें एक रूपसे देखना ही "ज्ञान" है। मनका विषयोंसे रहित हो जाना ही "ध्यान" है। मनके मैलोंको दूर करना ही 'ज्ञान' है और इन्द्रियोंके निग्रह करने को ही "शौच" कहते हैं।

( २१ ) प्र०—संसार-बन्धनसे किस तरह छुटकारा मिल सकता है ?

उ०—विषयोंमें लगे हुए चित्तको, विषयोंसे हटाकर, ब्रह्म में लगा देनेसे संसार-बन्धनसे छुटकारा हो सकता है।

( २२ ) प्र०—आत्माके साक्षात्कारमें बाधक कौन है ? परमात्माका स्पष्ट दर्शन कब होता है ?

उ०—आँख, कान, नाक प्रभृति इन्द्रियाँ और रूप, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि विषय अन्तर्थाकी जड़ हैं। इन्द्रियाँ सदा विषयोंकी ओर पुरुषको ले जाती हैं और विषय विष की तरह घातक हैं। विषयासक्तोंको आत्मा या परमात्माका दर्शन नहीं होता।

विषय और इन्द्रियाँ पैदा होनेवाले और नाश होनेवाले हैं ; किन्तु आत्मा अजन्मा और अविनाशी है ; अतः उसका और इनका मेल नहीं, क्योंकि मेल समान-समानका होता है ; नाशमान और अविनाशीका मेल हो नहीं सकता। आत्मा इन