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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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से परे और सबका साक्षी है। उस आत्माकी प्राप्ति सत्यसे होती है। सत्यसे ही मनका निरोध होता है। मनका निरोध होते ही आत्मा साफ दीखता है ; यानी शुद्ध साफ और निर्मल मनमें ही आत्मा दीखता है, जिस तरह साफ दर्पणमें चेहरा दीखता है। अशुद्ध मनमें आत्मा नहीं दीखता। अशुद्ध मन बन्धनका कारण और शुद्ध मन मोक्षका कारण है। मनके शुद्ध हो जानेसे चुरे भले कर्मोंका नाश हो जाता है। कर्मोंके नाश हो जानेसे पुरुष जीवन्मुक्त हो जाता है। मतलब यह है कि, आत्मा या परमात्माके दर्शन चाहनेवालोंको, इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाकर, मनको शुद्ध करना जरूरी है। जिस तरह लकड़ियोंके न रहनेसे अग्नि अपने कारणमें लय हो जाती है ; यानी बुझ जाती है ; उसी तरह वृत्तियोंसे रहित हुआ मन भी अपने कारणमें लय हो जाता है ; यानी शान्त हो जाता है। जब मन शान्त हो जाता है, उसको चञ्चलता नाश हो जाती है, वह स्थिर हो जाता है ; तब आत्माका दर्शन होने लगता है। जिस तरह चञ्चल हवासे हिलते हुए मैठे गवले जलमें सूरजका विम्ब या अक्स नहीं दीखता ; उसी तरह अशुद्ध, मैठे और चञ्चल चित्तमें आत्मा नहीं दीखता। अतः मनकी चञ्चलता और उसकी गन्दीगो की दूर करना जरूरी है।

( २३ ) प्रश्न—परमेश्वर कहाँ है ? उसका ध्यान कैसे करना चाहिए ?

उ०—यह जो हमारा शरीर है, यही उस देवता—परमेश्वर