वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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के रहनेका मन्दिर है। इसीमें जो चेतन जीव है, वही केवल “शिव” है। मनुष्यको हृदय-कमलमें परमेश्वरका ध्यान करना चाहिए। चञ्चल या चलायमान चित्तसे वह नहीं दीखता है।
( २४ ) प्रश्न—सारे दुःखोंका मूल कारण क्या है ?
उ०—तृष्णा—इच्छा। जिसके मनमें तृष्णा है, उसका मन सदा इधर-उधर भटकता रहता है, वह कभी शान्त नहीं होता। मनके शान्त हुए बिना प्राणीको सुख नहीं ; अतः तृष्णाको त्यागना चाहिए ; किसी भी वस्तुकी इच्छा न रखनी चाहिए। यहाँतक कि, स्वर्ग और मोक्षकी भी इच्छा न रखनी चाहिए।
( २५ ) प्रश्न—अगर यह जगत् जड़ है, तो यह चेष्टा कैसे करता है ?
उ०—वेशक यह जगत् जड़, नाशमान और दुःख-रूप है ; किन्तु ब्रह्म चेतन, नित्य और सुख-रूप है। जिस तरह बुम्बक पत्थरकी विलक्षण शक्तिसे लोहा चेष्टा करने लगता है ; उसी तरह ब्रह्मचेतन की विलक्षण शक्तिसे यह जगत् भी चेष्टा करता है।
( २६ ) प्र०—ईश्वर और जीव की एकता प्रमाणित् कुम्भो ।
उ०—ईश्वर और जीवमें भेद नहीं है। जैसे ब्रह्म निरवयव है और निराकार है ; वैसे ही जीव भी निरवयव और निराकार है। एक ही चेतन अन्तःकरण रूपी उपाधिोंके अन्तर्गत तो