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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५०४ )

जिन्दगी भी सदा नहीं रहती। मनुष्य पानीके बुल-बुलेको तरह पैदा होता और सड़ ही बिलाय जाता है। धन और प्रभुता भी सदा नहीं रहते। जो आज राजा है, कल वह फ़कीर हो जाता और दरदर मारा-मारा फिरता है। अतः इन पर फूटना—अभिमान करना, अज्ञानियोंका काम है।

(३२) प्र०—मनुष्यका सबसे बड़ा कर्तव्य—फ़र्ज़ क्या है ?

उ०—ईश्वर-भजन करना ; क्योंकि वह स्वामी है। स्वामी ध्यान दे, चाहे न दे ; पर सेवक को अपने कर्तव्य-पालन या फ़र्ज़ अदा करनेमें न चूकना चाहिए। जो उग्र विषय-भोगोंमें लुंधा बीत गई सो बीत गई ; पर जो वाकी रही है, उसका क्षण-क्षण परमात्माके भजनमें लगाना चाहिए, क्योंकि कौन जाने यह श्वास बाहर निकल कर भीतर न आवे।

किसीने कहा है :—

अरे भज हरेनाम क्रेमधाम कृणे—कृणे । वहिसरति निःश्वासे विश्वासः कः प्रवर्तने ॥

अरे जीव ! हरिके नामको क्षण-क्षण भज, हरिका नाम कल्याण का घर है। जो श्वास बाहर चला जाता है, उसके भीतर आनेका कौन विश्वास ? आवे और न आवे।

ऐसी ही बात कबीरदासने कही है :—

नव द्वारेका पींजरा, तामें पंखी पौन । रहने का आश्चर्य है, गमे अचम्मा कौन ॥