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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५०५ )

मनुष्य शरीर नौ दरवाजोंका पींजरा है। इसमें दो दरवाजे हैं, दो आँखोंमें, दो नाकमें, दो कानोंमें, एक मुँहमें, एक गुदमें और एक गुप्त इन्द्रियमें। इस तरह नौ द्वार हैं। इसी नौ द्वारके पींजरमें पवन-रूपी पक्षी—जीव रहता है। इतने द्वार होने पर भी, वह इस पींजरे में रहता है, यही आश्चर्य की बात है। इतने द्वारोंसे निकल जानेमें क्या आश्चर्य? तात्पर्य यह कि, जीव न जाने कब इस शरीरको छोड़ भागे। जब तक जीव इस शरीरमें है, तभी तक हरि-भजन या मोक्ष लाभ करनेकी तदबीरें की जा सकती हैं। जीवके इस शरीरसे निकल भागनेके बाद, यह मौका हाथसे निकल जायगा। जीव इस शरीरको त्यागते ही कीड़े, मकोड़े, साँप, छहूँ दर, बिल्लो, कुत्ते, गवे, घोड़े प्रभृतिकी योनियें जन्म ले लेगा। उन योनियोंमें ज्ञान-शक्ति नहीं होती; अतः उन शरीरोंमें जाकर मोक्ष-लाभ हो नहीं सकता। मनुष्य-शरीरसे ही मोक्ष मिल सकती है, पर मनुष्य-शरीर बार बार नहीं मिलता। ८४ लाख योनियाँ भुगत लेने पर मनुष्य-जन्म मिलता है; अतः इस सुअवसरको हाथसे गँवाना भारी अज्ञानता है। जो इसमें चूकेगा, लाखों-करोड़ों वर्ष तक पछतावेगा अतः जब तक जीवन है, मनको सब ओर-से शोक कर, विषयोंको विषवत् त्याग कर, हरिका भजन करो।

( ३३ ) प्र०—दैराग्य पैदा होने और पापोंसे बचनेका मूल कारण क्या है?