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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५०६ )

३०—मृत्युको याद रखना। मौतको याद रखनेसे पाप नहीं होते और वैराग्य उत्पन्न होता है। श्मशान-घाट पर जानेसे ही मनुष्यके बित्तमें वैराग्य उत्पन्न हो उठता है, पर वह घर आकर सब भूल जाता है, फिर विषयोंमें लग जाता है। एक बादशाहने पाप और अन्यायसे बचनेके लिये ही अपने दरबारमें, सामने ही, एक कूब्र बनवा रखी थी, कि कूब्रको देखते रहनेसे मुझसे अन्याय-कर्म न होंगे। मृत्यु अटल है। और सब टल जायँ, पर मृत्यु टल नहीं सकती, वह अवश्य आवेगी; चाहे आज आवे और चाहे कल। जिसने जन्म लिया है, उसे मरना ही होगा। जो मरनेकी बात भूल जाते हैं, जिन्हें यह याद नहीं रहता कि, हम दो दिन या दश दिनमें मरेंगे, वही पाप-कर्म करते हैं और उन्हें ही संसारसे विरक्ति नहीं होती। जिनको हर क्षण मौत दीखती है, उनका मन विषय-भोगों या स्त्री-पुत्र धन-दौलत प्रभृतिमें नहीं लगता। संसारसे मनके हटनेका ही नाम "वैराग्य" है।

( ३४ ) प्र०—कौन किसीका भी बुरा नहीं चाहता ?

३०—जो वैराग्यवान है, जिसे संसारकी असलियतका पता है, जिसे अपने जीवनका क्षण-मरका भी भरोसा नहीं है, जो धन-यौवन, शरीर और भोगोंको नाशमान् समझता है, जो सबके अन्दर एक चेतन आत्माको देखता है, वह भूल कर भी किसीका बुरा नहीं चाहता।

( ३५ ) प्र०—दुःखाँ और सुखाँका हेतु क्या है ?