वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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३०—संसारके भोगोंमें राग ही दुःखोंका और इनमें वैराग्य ही सुखोंका कारण है। दूसरे शब्दोंमें यों समझिये—जो संसारमें ममता रखता है, वह नाना प्रकारके दुःख भोगता है और जो संसारमें ममता नहीं रखता, संसारको त्याग देता है, वह परम सुख पाता है। वैराग्यके सिवा, संसारमें और कहीं सुख है ही नहीं, यह निश्चय है।
( ३६ ) प्र०—राग और वैराग्यका क्या कारण है ?
३०—विषयोंमें सुख मालूम होना ही रागका कारण है और इनमें दुःख मालूम होना ही वैराग्य का कारण है। जब मनुष्य धन और स्त्री पुत्र आदिसे सुखी होता है, तभी उसे इन सबमें राग या प्रीति होती है ; पर जब उसे इनसे दुःख होता है, तब उसे वैराग्य होता है। किसीको स्त्री खूब प्यार करती है, उसे अच्छी तरह आलिङ्गन करती है, उसको सेवामें हरदम खड़ी रहती है, उसके सिवा और किसी पुरुषको नहीं चाहती, तब मनुष्यका मन स्त्रीमें और भी फँसता है,—वही राग है। पर यदि स्त्री पुरुषको प्यार नहीं करती, उसके घरमें आते ही कलह करती है, कड़े शब्द कहती है, हर तरह तंग करती है, मीठी बातें नहीं बोलती, पर-पुरुषको चाहती है ; तब उसका मन स्त्रीसे हट जाता है, वह उसे बुढ़ी-मालूम होती है, अतः उसे वैराग्य हो जाता है। महाराजा भर्तृहरिको जबतक यह मालूम था कि, पिंगला मुझे खूब चाहती है, अष्ट बहर मेरा ही भजन करती है, तब तक उनका मन उसीमें फँसा