वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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३०—संसारके भोगोंमें राग ही दुःखोंका और इनमें वैराग्य ही सुखोंका कारण है। दूसरे शब्दोंमें यों समझिये—जो संसारमें ममता रखता है, वह नाना प्रकारके दुःख भोगता है और जो संसारमें ममता नहीं रखता, संसारको त्याग देता है, वह परम सुख पाता है। वैराग्यके सिवा, संसारमें और कहीं सुख है ही नहीं, यह निश्चय है।
( ३६ ) प्र०—राग और वैराग्यका क्या कारण है ?
३०—विषयोंमें सुख मालूम होना ही रागका कारण है और इनमें दुःख मालूम होना ही वैराग्य का कारण है। जब मनुष्य धन और स्त्री पुत्र आदिसे सुखी होता है, तभी उसे इन सबमें राग या प्रीति होती है ; पर जब उसे इनसे दुःख होता है, तब उसे वैराग्य होता है। किसीको स्त्री खूब प्यार करती है, उसे अच्छी तरह आलिङ्गन करती है, उसको सेवामें हरदम खड़ी रहती है, उसके सिवा और किसी पुरुषको नहीं चाहती, तब मनुष्यका मन स्त्रीमें और भी फँसता है,—वही राग है। पर यदि स्त्री पुरुषको प्यार नहीं करती, उसके घरमें आते ही कलह करती है, कड़े शब्द कहती है, हर तरह तंग करती है, मीठी बातें नहीं बोलती, पर-पुरुषको चाहती है ; तब उसका मन स्त्रीसे हट जाता है, वह उसे बुढ़ी-मालूम होती है, अतः उसे वैराग्य हो जाता है। महाराजा भर्तृहरिको जबतक यह मालूम था कि, पिंगला मुझे खूब चाहती है, अष्ट बहर मेरा ही भजन करती है, तब तक उनका मन उसीमें फँसा
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रहा ; लेकिन ज्योंही उन्हें मालूम हुआ कि, वह पर-पुरुषरता है ; यह कुलटा है और अश्वपालसे प्रीति रखती है, उन्हें संसारसे विरक्ति हो गई। वे राजपाट धन-दौलत सबको त्याग संन्यासी हो गये।
( ३७ ) प्र०—क्या गृहस्थाश्रममें वैराग्य हो सकता है ?
उ०—सबकी पैदायश ही गृहस्थाश्रमसे है। गृहस्थीमें सदा सुख ही रहे, ऐसा हो नहीं सकता। इसमें एक-न-एक दुःख बना ही रहता है। कभी लड़का मरता है, कभी स्त्री मरती है, कभी धन नाश हो जाता है, कभी ऋण-भार सिर पर चढ़ता है, कभी शत्रु सताते हैं ; अतः मनुष्यको जरा-बहुत वैराग्य होता ही रहता है ; पर यह मन्द वैराग्य होता है। जब मनुष्य पर कष्ट आता है, उसे वैराग्य होता है ; पर ज्योंही दुःख टल कर सुखकी बड़ी आती है, उसका वैराग्य नहीं रहता पर वैराग्यका मूल कारण है गृहस्थाश्रम ही। रामचन्द्रजी और वशिष्ठजी प्रभृति महापुरुषोंको गृहस्थीमें ही वैराग्य हुआ था। जनक प्रभृतिको गृहस्थाश्रममें ही ज्ञान हुआ था। जनक महा-राज गृहस्थीमें रहकर भी सच्चे त्यागी थे और उन्हें लोग विदेह कहते थे। ज्ञानका कारण वैराग्य है। जिसे गृहस्थाश्रममें वैराग्य है, वह ज्ञानी है ; पर जिसे संन्यासाश्रममें भी राग है, वह अज्ञानी है। खूब याद रक्खो, बिना वैराग्य ज्ञान नहीं होता और बिना ज्ञानके मोक्ष नहीं होती। जो मनुष्य गृहस्थीमें रहकर भी उसमें कमलको तरह रहता है, उसकी
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मुक्ति हो जाती है। यद्यपि कमल जलमें रहता है, पर पानी उस पर नहीं ठहरता; इसी तरह जो गृहस्थीमें रहता है, गृहस्थीके सब काम विषय-भोगादि करता है; पर उनमें ममता या आसक्ति नहीं रखता, वह जीवन्मुक्त है। राजा जनक, गृहस्थीमें रहकर क्या नहीं करते थे? पर उनकी आसक्ति या ममता किसी भी पदार्थमें नहीं थी।
( ३८ ) प्र०—संसारमें कौन है और पुरुष कौन है?
उ०—जो पुरुष अपने हृदयमें रहनेवाले पुरुषरूप स्वप्रकाश आनन्द-रूप आत्माको नहीं जानता, वह कौ है; क्योंकि जैसे स्त्रीका पति उससे अलग होता है; उसी तरह उस आत्माको न जाननेवालेने भी अपनेसे अलग पति मान रक्खा है। मतलब यह, जिसमें वैराग्य और आत्म-विचार नहीं, वह स्त्री है।
( ३९ ) प्रश्न—ईश्वरके भजन-स्मरणमें वैराग्यकी क्या ज़रूरत है।
उ०—बिना वैराग्यके पुरुषका मन ईश्वर-भजनमें नहीं लगता, इसलिये वैराग्यकी ज़रूरत है। मन एक है। जब तक वह विषय-भोगोंमें लगा रहता है, तब तक वह ईश्वरमें नहीं लग सकता; लेकिन जब वह विषय-भोगोंसे हट जाता है, तब वह ईश्वरमें लग जाता है। जब मनमें विषय-भोगोंकी भाव-बनी रहती है, जब यह विषय-भोगोंकी लाटलासे भरा रहता है, तब उसमें ईश्वरके लिये जगह नहीं रहता; लेकिन जब वह विषय-भोगोंसे खाली हो जाता है; यही शुद्ध और साफ हो
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जाता है; तब उस निर्मल और खाली मनमें परमेश्वर बैठ सकता है। अतः परमेश्वरके दर्शन चाहनेवालेको पहले वैराग्य द्वारा अपना मन शुद्ध करना चाहिए।
( ४० ) प्रश्न—संसारमें सर्पसे भी भयङ्कर कौन है?
४०—स्त्री सर्प भी से भयंकर है। सर्पके विषसे मनुष्य एक बार ही मरता है; पर स्त्रीके विषसे बार-बार मरता है; यानी वासना बनी रहनेसे, वह बार-बार जन्म लेता और मरता है।
( ४१ ) प्रश्न—स्त्री-रूपी सर्पके विषसे बचनेका क्या उपाय है?
४०—स्त्रीकी याद न करना और उसे कभी न देखना। उसकी छायासे भी दूर रहना।
( ४२ ) प्र०—स्त्री-सङ्गसे क्या हानि है?
४०—जिसमें जिसकी वासना रहती है, वह स्वप्नमें भी दीखता है; इसी तरह मरण-कालमें जब पुख्णकी वासना स्त्रीमें रहती है; तब उसको प्रात करनेके लिये वह फिर शरीर धारण करता है। मरते समय विशेष कर स्त्रीमें मन रहता ही है। इससे ज्ञानी लोग पहले ही स्त्रीसे अलग हो जाते हैं; जिससे मरण-कालमें उसमें वासना न रहे। इसके सिवा कामी पुख्ण और स्त्रियोंके सङ्गसे पुख्ण कामी हो जाता है और दूसरा जन्म लेनेपर क्रोधी और मोही होता है। काम क्रोध और मोह प्रभृतिसे मन अशुद्ध हो जाता है। अशुद्ध मनमें
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ब्रह्मज्ञान नहीं उद्भवता । जो मनुष्य ब्रह्मज्ञान-शून्य होता है ; वह कीड़े मकोड़ोंकी योनि पाता है । इन शरीरोंको पाकर फिर वह नरकसे नहीं निकल सकता ; इसलिये स्त्रियोंका सङ्ग नहीं करना चाहिये ।
( ४३ ) प्र०—सच्चा ज्ञानी कैसा होता है ?
उ०—जिसका किसी पदार्थमें राग न हो, यहाँ तक कि स्त्री पुत्र प्रभृतिमें भी राग न हो । अगर संन्यासी हो तो मठ, खेलों और धन प्रभृतिमें राग न हो, शत्रु-मित्र आदि सब जीवोंको एक नज़रसे देखे-किसीको अपना और किसीको पराया न समझे ; किसीको भी जिससे भय न हो और किसीसे भी जिसे भय न हो ; जो आत्माको असर और अविनाशी तथा शरीरसे अलग समझता हो ; जो सब प्राणियोंमें एक आत्मा-को देखता हो ; जो ईश्वर और जीवमें भेद न समझता हो ; जो नष्ट हुए, मरे और बीतों बातका शोक न करता हो, यानी सर्वस्व नाश हो जाने और पुत्र तथा स्त्री तकके मर जाने पर भी, नाम मात्रको भी रक्ष न करता हो, वही सच्चा ज्ञानी है । किन्तु जो ज्ञानीकी सी वार्ते तो वधारता ही पर वैराग्यसे शून्य हो, वह बन्ध्यज्ञानी है ।
( ४४ ) प्र०—चित्तकी शुद्धिका साधन क्या है ।
उ०—शुद्ध अन्न ।
( ४५ ) प्र०—शुद्ध अन्न कैसा होता है ?
• उ०—जो सत्य धर्मसे कंमाया जाता है, वही शुद्ध द्रव्य
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होता है। उस शुद्ध दृश्यसे जो खाने पीनेके पदार्थ खरीदे जाते हैं, वही शुद्ध कहे जाते हैं। वैसे शुद्ध पदार्थोंके खानेसे मन शुद्ध हो जाता है ; क्योंकि अन्नके द्वारा सत्य-धर्मका असर चित्त पर भी होता है। शुद्ध चित्तमें ही वैराग्य और विवेक आदि पैदा होते हैं। असलमें सत्य बोलना सर्वोपरि है। सत्यसे योही चित्त शुद्ध हो जाता है और इससे अन्न भी शुद्ध होता है ; इसलिये हमेशा सत्यके आश्रय रहो ; सत्यको न त्यागो। सत्यके समान जगत्में कोई दूसरा धर्म या भक्ति-उपासना नहीं है।
( ४६ ) प्र०—चोर और दुष्टोंको भी साधु बनाने वाला क्या है ?
उ०—“सत्सङ्ग ।” सत्सङ्गकी महिमा शेष शारदा भी नहीं गा सकती। कमल पर स्थित जलकी बूँद भी मोती-जैसी लगती है। लोहा काठके सङ्गमें रहनेसे जलमें नहीं डूबता। नदी-नालोंका जल भी गङ्गाजलके सङ्ग मिल कर गङ्गाजल हो जाता है। नागरपानके सङ्ग ढाकका पत्ता भी राजा तक पहुँच जाता है। चींटी फूलमें बैठकर महादेवजीके सिर पर चढ़ जाती है। चन्दनके साथ नीम भी चन्दन हो जाता है। पारस-एश्वरको छू जानेसे लोहा कुन्दन हो जाता है। बाँस मिश्रीके साथ मिलकर उसीके साथ तुलता है। सत्सङ्गसे ही घोर बनमें जाकर डाकूपना करनेवाले भोल बाबूजीकीजिगी महषि हो गये ; अतः सत्सङ्गको चित्तकी शुद्धिका मुख्य उपाय
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समझना चाहिए, और कुशलसे बचना चाहिए। क्योंकि उस से चित्त अशुद्ध हो जाता है।
( ४७ ) प्र०—क्या चित्तकी शुद्धिका और भी कोई उपाय है ?
उ०—हाँ, परोपकार या दूसरों पर दया करने से भी चित्त शुद्ध हो जाता है। दयालुचित्त मनुष्य ही दूसरोंका भला करते हैं। असलमें चित्त-शुद्धिका “दया” मुख्य साधन है। जो मनुष्य-शरीर पाकर उपकार नहीं करता, वह पशुओंसे भी गया-बीता है। ईश्वरने मनुष्य-शरीर परोपकारके लिये ही दिया है। शास्त्रोंमें लिखा है—“धन और प्राणोंसे परोपकार करना चाहिये ; क्योंकि परोपकारके बराबर सौ यज्ञोंका भी पुण्य नहीं है। जो परोपकारहीन है, उसका जीना वृथा है। जानवरोंका चमड़ा भी पराये काम आता है। अपने लिये कौन नहीं जीता ? जो पराये लिये जीता है, वही जीता है। वृक्ष अपने लिये फल नहीं देते, नदियाँ अपने लिये नहीं बहतीं, शेषजीने पृथ्वी परोपकारके लिये ही अपने खिर पर धर रखी है। भगवान् कृष्ण पराये कामके लिये ही सारथी बने थे। सन्त लोग परोपकारके लिये ही शरीर धारण करते हैं ; अतः मनुष्यका सबसे बड़ा कर्तव्य परोपकार या दया करना है। इससे चित्त शुद्ध हो जाता है और शुद्ध चित्तमें परमात्माके दर्शन हो जाते हैं।
• ( ४८ ) प्रश्न—ज्ञानवानकी नज़रमें सबमें एक ही आत्मा
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है, तो फिर ज्ञानी सबके साथ खान-पानादि क्यों नहीं करता ?
३०—ज्ञानी दो तरहके होते हैं।
( ४६ ) (क) जीवन्मुक्त, जिन्हें अपनी देहकी भी सुख नहीं होती। वे राजा जनककी तरह विदेह और अजगर वृत्तिवाले होते हैं। वे न किसीसे भिक्षा माँगते और न कहीं जाते हैं। अगर कोई उन्हें खिला देता है, तो खा लेते हैं ; कोई जल पिखा देता है, तो जल पी लेते हैं। कोई धूपमें बिठा देता है, तो वहीं बैठे रहते हैं और कोई वर्षामें पटक देता है, तो वहीं पड़े रहते हैं। उन्हें धूप, छाया और वर्षा सब समान हैं। वह आत्मानन्दमें डूबे रहते हैं। उनको जगत् नहीं दीखता। उन्हें सर्वत्र आत्मा ही आत्मा दीखता है। उनकी नजरमें न कोई ब्राह्मण हैं और न भंगी बमार ; उनको तो आत्मा ही आत्मा दीखता है ; अतः उनके मुँहमें ब्राह्मण अन्न डाल दे तो वैसा ही, भंगी अन्न डाल दे तो वैसा ही ; उनको दोष नहीं लगता। दोष उन्हें लगता है, जिन्हें वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान होता है। वह तो सब तरह निर्दोष हैं। वेदादिक शास्त्रोंकी आज्ञा भी उन पर नहीं चलती, क्योंकि वह तो ब्रह्मरूप हैं और महान सुख में डूबे रहे हैं। ऐसे महापुरुष जीवन्मुक्त हैं।
( ख ) दूसरे प्रकारके ज्ञानियोंकी गिन्ती आचार्य-कोटिमें है। वे भी सब प्राणियोंमें एक ही आत्मा देखते हैं, इसीसे वे किसीसे राग-द्वेष नहीं रखते ; परन्तु वे समवर्त्ती नहीं होते।
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वे भङ्गी चमार और ब्राह्मण सबका भूटा नहीं खाते, क्योंकि उन्हें वर्णाश्रम-धर्मका ज्ञान है। सब तरहके व्यवहार और वर्णाश्रम-धर्मको समझनेवाला यदि सबके साथ खावे पीवेगा, तो उसे दोष लगेगा। जो पागलोंकी तरह होता है, जिसे क्या करना चाहिये और क्या न करना चाहिये; क्या विधि है और क्या निषेध है; इन बातोंका ज्ञान नहीं होता, उसे दोष नहीं लगता। सब किसीसे समान वस्त्रांव करने या हर किसीके साथ खाने-पीनेसे कोई ज्ञानी नहीं हो सकता। अगर ऐसा होता, तो भंगी चमार, जो सबका भूटा खाते हैं, ज्ञानी कहलाते। ज्ञानी वही है, जिसमें राग-द्वेष आदि नहीं हैं तथा जो आत्मानन्दसे आनन्दित है; पर जिसमें राग-द्वेष हैं, जो विषय-भोगोंमें आनन्द मानता है, वह ज्ञानी नहीं—अज्ञानी है।
पाप-पुण्य उसे लगते हैं, जिसे ज्ञान होता है। बालकको धर्म-अधर्म और पुण्यपापका ज्ञान नहीं होता, इसीसे उसे पाप-पुण्य नहीं लगते। बालकको आचारका ज्ञान नहीं होता। वह ऊपर मुँहसे रोटी खाता जाता है और नीचेसे मलमूर्त्र त्याग करता जाता है। लोगोंको उसकी इस क्रिया पर ग्लानि नहीं होती। इसी तरह जीवन्मुक्तको पाप-पुण्य नहीं लगते, वह चाहे जो करे, क्योंकि उसे ज्ञान ही नहीं। उसके भले-बुरे कामोंको देखकर कोई उसे भला-बुरा भी नहीं कहता। किन्तु आचार्य कोटिके ज्ञानी यदि मांस-मदिरा खेवन करें, हर
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किसीका जूठा खाँप, पर खी-गमन करें, तो उन्हें पाप ज़रूर लगेगा ; क्योंकि उन्हें सब तरहका ज्ञान होता है और लोग भी उनसे घृणा करते हैं। आचार्य-कोटिमें बही ज्ञानी है, जो उन कामोंको नहीं करता, जिनके शास्त्रोंमें मनाही है और उन कामोंको करता है, जिनके शास्त्रोंमें आज्ञा है। किन्तु जिन कामोंको करता है, उनको निष्काम होकर अनासक्ततासे श्रेष्ठ आचारके लिये करता है अथवा निषिद्ध और विहित दोनों कर्म नहीं करता ; यानी जिनकी शास्त्रोंमें आज्ञा है और जिनकी मनाही है, दोनों ही प्रकारके काम नहीं करता ; केवल आत्म-चिन्तन ही करता है, वह आचार्य-कोटिमें है।
( ५० ) प्र०—मुक्त कित्से कहते हैं ?
उ०—जिस पुरुषका मोक्षमें अभिमान है, देहादिकोंमें ममता है, वह न योगी है और न ज्ञानी ; पर जो किसी की निन्दा करता है और न स्तुति ; न किसीको देता है और न किसी से लेता है ; जो सर्वत्र राग-रहित है, यानी जिसे किसी भी पदार्थ—छी-पुत्र धन-जायदाद प्रभृति से राग नहीं—किसी में भी ममता नहीं—वही मुक्त है। जिसका मन अपने तर्ह चाहने वाली छीको सामने देखकर अथवा मौतको सामने देख कर भी व्याकुल नहीं होता, वही मुक्त है।
( ५१ ) प्र०—क्या आत्मा ऊँच और नीच नहीं होता ?
उ०—आत्मामें भविष्यत्ता और नोचता नहीं। एक ही आत्मा ऊँच-नीच सब शरीरों में है। शरीरोंके गुण-दोषोंसे
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वह गुण-दोषवाला नहीं होता। एक ही आकाश मन्दिरमें भी है, पाखाने में भी है, भंगी-चमार के घरों में भी है; उत्तमोत्तम मूर्तियों में भी है, मल मूत्रकी बाहिट्यों में भी है, परन्तु अति सूक्ष्म होनेके कारण, उसका उपाधियोंसे कोई सम्बन्ध नहीं; वही बुढ़ी-भली उपाधियोंके कारण बुरा भला भी नहीं होता। यही बात आत्माके सम्बन्धमें हैं। आत्मा तो आकाश से भी सूक्ष्म है, ; अतः वह असंग और निलंघ है।
(५२) प्र०—संसार में कितने प्रकारके मनुष्य हैं और उनमें से कौनसे परमात्माके दर्शन करते हैं?
उ०—संसार में तीन तरहके मनुष्य हैं :—(१) कृपण और आलसी, (२) विषय-भोगी, (३) उदार और उद्योगी। इनमें से पहले प्रकार के कङ्कूस और आलसी तो कभी परमात्मा तक पहुँच ही नहीं सकते; क्योंकि वह हाथोंसे दान नहीं करते और पैरोंसे महात्माओं तक नहीं पहुँचते। दूसरे प्रकारके—विषय-भोगी अन्धे हैं। उन्हें न परमार्थ दीखता है और न परमेश्वर; इसलिये वह परमेश्वर का भजन-पूजन नहीं कर सकते। तीसरे प्रकार के लोग उद्योगी और दाता हैं। वे हाथोंसे दान करते और पैरोंसे चल कर महात्माओंकी सेवामें पहुँच जाते हैं; अतः सत्सङ्गके कारण उन्हें ज्ञान हो जाता है। उनका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है; इसलिये वह परमेश्वरके दर्शन पाते हैं।
• जो पुरुष रात-दिन स्त्री-पुत्रोंकी सेवामें लगे रहते हैं, रात
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दिन उनके ही सुख-चैनकी फिक रखते हैं, वह कभी सत्सङ्ग नहीं करते ; इसलिये वह स्त्री-पुत्रोंको फिक करते-करते ही मर जाते हैं और फिर जन्म लेते और मरते हैं। उनकी मोक्ष नहीं होती।
जो पुरुष वेद-शास्त्रोंमें लिखे हुए कर्म करते रहते हैं, वह कभी आत्माका झयाल भी नहीं करते ; वह कर्म करते-करते ही मर जाते हैं। उनकी भी मोक्ष नहीं होती।
जो पुरुष वेद-शास्त्रोंकी परवा न करके, आत्मविचार छोड़ कर और किसी ओर ध्यान ही नहीं देते, उनको परमानन्द या मोक्ष की प्राप्ति होती है।
( ५३ ) प्र०—सब वेद-शास्त्रोंका सार क्या है?
उ०—ब्रह्म सत्य है, जगत् मिथ्या है, जीव ब्रह्मरूप है और दूसरा कोई नहीं—यही सब शास्त्रोंका सारतत्व है।
( ५४ ) प्र०—प्राणी-बन्धनसे कब छूटता है?
उ०—जब मनुष्य इस बातको समझ लेता है कि, आत्मा असङ्ग, अकर्ता, अभोक्ता और चैतन्य स्वरूप है ; तभी वह बन्धनसे छूट जाता है ; अर्थात् अपने असली स्वरूपका ज्ञान हो जाना ही मुक्तिका हेतु है।
( ५५ )—जीव और ईश्वरका मेल कब होता है।
उ०—जब अविद्या और माया त्याग दी जाती हैं ; तब ईश्वर और जीवका मेल हो जाता है। इन दोनोंके मेलमें “अविद्या और माया” वाचक हैं।
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( ५६ ) प्र०—परमेश्वर कहाँ रहता और वह किस तरह मिलता है ?
उ०—परमेश्वर इसी कायामें रहता है। जब तक जीव उसे बाहर खोजता फिरता है, वह नहीं मिलता ; लेकिन जब वह उसे इस कायामें ही खोजता है तब वह मिल जाता है और प्रसन्न होकर पिताकी तरह पुत्रको मोक्ष-रूपी महान फल देता है। असलमें ईश्वर इसी कायामें रहता है ; पर सूक्ष्म लोग उसे काशी, द्वारका, रामेश्वर आदिमें खोजते फिरते हैं। ऐसे अज्ञानी भटकते-भटकते मर जाते हैं। पर ईश्वर नहीं मिलता। वे लोग—“छोरा बगलमें दिंदोरा शहरमें” वाली कहावत खरिताथे करते हैं।
( ५७ ) प्र०—किनका अधिकार मोक्षमें है और किनका कर्ममें ?
उ०—जो पुरुष कर्म करते हुए भी अपने तई कर्मोंका करने वाला और उनके फल भोगने वाला नहीं मानते, अपने तई असंग और सच्चिदानन्द स्वरूप समझते हैं, वे ही ज्ञान और मोक्षके अधिकारी हैं ; किन्तु जो समझते हैं कि, हम इस कामको करते हैं और हम ही इसका फल भोगेंगे, उनका कर्ममें अधिकार है, उनकी मोक्ष हो नहीं सकती ; ईसीलिहे भगवान्ने कहा है—कर्म करो, पर निष्काम होकर करो ; यानी फल-प्राप्तिकी इच्छासे कर्म मत करो। यदि कोई पुरुष इस विचारसे ईश्वर भजन करेगा कि, मुझे इसके फल-स्वरूप
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राज्य-सुख और लोपुशदि मिलें', तो उसे मरकर जन्म लेना होगा और वह इच्छित फल उसे भोगने होंगे। लेकिन जो, बिना किसी कामनाको मनमें रखे, ईश्वर-भजन करेगा, उसे फल भोगनेको जन्म न लेना होगा ; यानी उसकी मोक्ष हो जायगी।
( ५८ ) प्र०—जीव डरता क्यों है ?
उ०—जीव अज्ञानसे डरता है। वास्तवमें उसे किसीका भय नहीं। जब मन किसी दूसरेकी कल्पना करता है, तभी उसे भय लगता है। असलमें, एक अपने आत्माके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं, फिर डर और भय किसका ? असलमें सब आफूतोंकी जड़ यह मन है। वास्तवमें न बन्धन है न मोक्ष। बन्धन और मोक्ष मनके सङ्कल्प मात्र हैं। मनके शान्त होनेपर वे शान्त हो जाते हैं। जिस तरह बच्चा अपनी ही परछाहीं से डरता है ; उसी तरह यह जीव अपने संकल्पोंसे डरता है।
( ५९ ) प्र०—क्या आत्मा सचमुच अजर और अमर है ?
उ०—बेशक ; आत्मा अनादि, अजर और अमर है। यह जीव अज्ञानके कारण अपने अजर अमर आत्मामें जन्म और मरण आदि मानता है। जब इसे किसी सत्पुरुषका उपदेश मिलता है, तब इसे होश होता है। उस समय यह अपने तर्ज अजर और अमर समझकर, जन्म-मरणसे रहित हो जाता है। जिस तरह एक बनियेको, गेह-घुले लोटेके जलसे आबद्धस्त लेने
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पर, गुदेा द्वारा खून गिरनेका भ्रम हो गया था ; उसी तरह जीवको अपने स्वरूपमें भ्रम हो रहा है ।
( ६० ) प्र०—इस जीवको सुख कब मिलता है ?
उ०—जब यह जीव अहङ्कार और ममताको त्याग देता है । जबतक मनुष्यके मनमें “मैं और तू” का भगड़ा रहता है, जब तक उसकी ममता खी-पुत्र और घर-मकान आदिमें रहती है, तब तक उसे सुख नहीं होता ।
( ६१ ) प्रश्न—यह संसार असार और महा मलिन है ; फिर लोग इसकी मोह-ममतामें क्यों फँसे हैं ? इसे त्यागते क्यों नहीं ?
उ०—जो लोग मोह-ममतामें फँसे हैं, उन्हें मलिन वस्तुओंसे भी घृणा नहीं होती । जिस तरह भङ्गीको मैलेके देखने या उठानेसे नफ़रत नहीं होती ; उसी तरह मोह-ममतामें फँसे हुए गृहस्थोंको ऐसे गृहस्थभ्रमसे भी घृणा नहीं होती, जो महागन्द्गीका स्थान और दुःख-शोकका भण्डार है । कहीं गृ पड़ा है, कहीं वमन पड़ी है, कहीं रहट पड़ा है, कहीं शूक और खलार पड़ा है, कहीं कोई रोता है, और कहीं कोई हाय-हाय करता है । वजह यह है कि, उनका खभाव ही भङ्गीकी तरह वैसा ही हो जाता है । उनका दिमाग गन्दा हो जाता है । घर-गृहस्थीकी मलिनता और गन्द्गी प्रभृति उनके दिमागमें समा जाती है । कृसाईखानेकी दुर्गन्ध कृसाईयों के दिमागमें समा जाती है । मोचीखानेकी बदबू मोचियोंके भीयमें समा जाती है ।
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तात्पर्य यह है, जिनके अन्तःकरण मोह और ममतासे मैले हो गये हैं, उनको गृहस्थीके नाना प्रकारके दुःख देखकर भी गृहस्थीसे घृणा नहीं होती ; किन्तु जिनके अन्तःकरण सत्सङ्ग से शुद्ध हो जाते हैं, उनको गृहस्थीसे नफ़रत होने लगती है । उन्हें गृहस्थी जञ्जाल मालूम होती है । बाज़-बाज़ लोग बेगारमें पकड़े हुओंकी तरह गृहस्थीमें काम करते हैं और ज्योंही मौका पाते हैं त्योंही छोड़ भागते हैं ।
( ६२ ) प्र०—गृहस्थीमें भी किले विशेष नहीं होता ?
उ०—जिसमें ममता नहीं, उसे विशेष क्यों होने लगा ? जो ममता त्यागकर गृहस्थीके काम करता है, उसे विशेष नहीं होता । जिले संसारी विषय-भोगोंमें ममता नहीं, वह घरमें रहता हुआ भी सुखी है । जिसमें ममता है, वह गृहत्यागी भी दुःखी है ।
( ६३ ) प्र०—मनके निरोधके साधन क्या हैं ?
उ०—वैराग्य और अभ्यास । मनुष्य या देवताकी मूर्ति या सूरज चन्द्रमा प्रभृति जो अपनेको प्यारे लगते हों, उनमें मनको लगाकर मनका निरोध करना चाहिए । पहले मनको स्थूल पदार्थोंमें लगाना चाहिए । जब मन स्थूलमें लगने लगता है, तब धीरे-धीरे अभ्यासले सूक्ष्ममें जाकर उहर जाता है । बिना स्थूल पदार्थोंमें लगे, सूक्ष्ममें मन लग नहीं सकता । बिना मनके एक जगह उहर, परमात्मन् मिल ही नहीं सकता । मतलब यह है, मन के रोकने या उहरानेमें ही परम सुख है और
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उस के इधर-उधर भटकानेमें घोर दुःख है। मूर्त्ति-पूजा इसी लिये जारीकी गई थी, कि लोग् स्थूल मूर्त्ति का ध्यान करते-करते सूक्ष्म आत्माके ध्यान करने योग्य हो जायँ। जब स्थूल स्थूल मूर्त्ति में ही मन न लगेगा, तब सूक्ष्म आत्मा में कैसे लगेगा? भूगोल या जुगराकिया पढ़ने वाले पहले नक़शा देखते हैं। नक़शा देखते-देखते फिर सारे पहाड़ और देश तथा नगर प्रभुति उनकी नज़रमें जम जाते हैं। नक़शा सामने न होने पर भी, सारा नक़शा उनको अपने नेत्रोंके सामने दीखने लगता है। उसी तरह मूर्त्तिपर ध्यान जमाने वालोंका, पीछे, अभ्याससे बिना मूर्त्ति, ध्यान जमने लगता है। मूर्त्ति में भगवान् नहीं हैं, मूर्त्ति खाली ध्यान जमानेका साधन-मात्र है। जो मूर्त्ति को ही भगवान् मान लेते हैं, वे अज्ञानी हैं।
जो लोग कहा करते हैं कि, मूर्त्तिपूजा से ईश्वर नहीं मिलता उन्हें महाकवियों के निम्नलिखित वाक्यों पर ध्यान देना चाहिये :—
( १ )
आखिर को इश्वके कुक से ईमान हो गया ।
मैं बुत-परस्तियों से सुसन्मान हो गया ॥१॥
मैं मूर्त्तिपूजा करते-करते ईश्वर-भक्त हो गया । प्रतीक के द्वारा ही मुझे ईशप्रप्ति हुई । मुझे अस्तंत से सत्तकी प्राप्ति हुई ।
( ५२४ )
काबे जाना भी तो बुतखानेसे होकर आहिद ।
दूर इस राह से अल्लाह का घर कुछ भी नहीं ॥ २ ॥
भक्त महाशय ! अगर काबे जाना हो तो जाओ ; पर मन्दिर में हो कर भी एक राह उधरको जाती है। सब तो यह है, कि उस मार्गसे अल्लाहका घर कुछ भी दूर नहीं है। मूल्चिपूजा से भी ईश-प्राप्ति अनायास हो जाती है।
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं ।
उसकी सूरत को देखता हूँ मैं ॥३॥
तेरी सूरतमें मुझे ईश्वर की माया दीखती है। तेरा चेहरा उसको स्ष्टि का बढिया नमूना है।
तेरी खूबसूरती को देखकर मेरा दिल कठेजसे निकला पड़ता है, तो तेरा गढ़ने वाला तो तुम्हें से भी बढ़कर होगा ; अतः मैं तुझे छोड़, उस से ही प्रेम क्यों न करूँ ? बहुत से लोग ईश्वरकी कुदरतके नमूने या प्राकृतिक शोभा देख-देख कर सच्चे ईश्वर-भक्त बन गये हैं।
( २ )
( ६४ ) ईश्वर सर्व व्यापक कहलाता है, पर वह दीखता क्यों नहीं ? उसे कैसे देख सकते हैं ?
उ०—हाँ, ईश्वर सर्वत्र है। जमीन, आस्मान, सूरज, चाँद, समुद्र, नदी, पशु, पक्षी और मनुष्य सबमें ईश्वर है। उसे देखने के लिये उत्तुङ्ग रहो, उसके प्रेममें डूब जाओ, वह दीखेगा। पर
( ५२५ )
यह भी याद रखो, कि वह इन चमड़ेकी आँखोंसे नहीं दूखता, वह ज्ञान की आँखों से दीखता है।
महा कवि दाग कहते हैं :—
यहाँ भी तू वहाँ भी तू जूसी तेरी फलक तेरा । कहीं हमने पतापाया न हरगिज आजतक तेरा ॥
यहाँ भी तू है और वहाँ भी तू है। ये जमीन आस्मान सब तेरे ही हैं। फिर भी तेरा पता नहीं मिलता। कहीं तेरी सर्वव्यापकता ही तो तेरे गुप्त होनेका कारण नहीं ?
रहिए सुरताक जलव-ये दीदार । हमने माना नजर नहीं आता ॥
रसके दर्शनोंके लिये इच्छुक रहनेकी आवश्यकता है। यह दूसरी बात है कि, वह दिखाई न दे।
देख गर देखना है जौं कि वह परदानशी । दीदये रोजने दिलसे है दिखाई देता ॥
अगर तू उस पर्दानशीन यार को सम्मुख ही देखना चाहता है, तो उसे मानस चक्षुओं से देखने की कोशिश कर, क्योंकि चर्मचक्षुओं से वह नहीं दीखता।
कृष्ण भगवान् स्वयं गीतामें कहते हैं :—
“विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषां” मूढ़ लोग ईश्वर को नहीं देख सकते। सिर्फ वही देख सकते हैं, जिनके
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ज्ञानके नेत्र हैं ; यानी ईश्वर ज्ञानकी आँखों से दीखता है, चमड़ेको आँखोंसे नहीं दीखता ।
कहाकबि गालिब कहते हैं :—
असले शहद शाहिदो मशहद एक हैं ।
हैरों हूँ फिर मुशाहिदा है किस हिसाब में ॥
जब देखने वाला, दृश्य और दर्शक एक ही हैं । जब सब में एक ईश्वर है ; तब फिर किसका दर्शन किया जाय ? सारे संसार में ब्रह्म व्यापक है और वह मैं ही हूँ, "सोऽहं भाव" दिखाया है ।
और भी—
कतरेमें दजला दिखाई न दे और जुजब में कुल ।
खेल लडकोंका हुआ दीदये बीना न हुआ ॥
वूँ दमें जिसने समुद्रको न देखा और व्यष्टिमें सप्तष्टि को-तो वह ज्ञान-वशु ही क्या हुए ? आत्मसाक्षात्कार कोई लड़कों का खेल थोड़े ही है । इसमें शुद्ध अद्भुतवाद है ; यानी जीव ब्रह्म सब एक ही हैं और एक ब्रह्म के लिवा दूसरा और कोई नहीं है ।
उस्ताद जौक कहते हैं :—
दाना खिरमन है हमें, कतरा है दरिया हमको ।
आये हैं जुजमें नजर कुलका तमाशा हमको ॥