वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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उस के इधर-उधर भटकानेमें घोर दुःख है। मूर्त्ति-पूजा इसी लिये जारीकी गई थी, कि लोग् स्थूल मूर्त्ति का ध्यान करते-करते सूक्ष्म आत्माके ध्यान करने योग्य हो जायँ। जब स्थूल स्थूल मूर्त्ति में ही मन न लगेगा, तब सूक्ष्म आत्मा में कैसे लगेगा? भूगोल या जुगराकिया पढ़ने वाले पहले नक़शा देखते हैं। नक़शा देखते-देखते फिर सारे पहाड़ और देश तथा नगर प्रभुति उनकी नज़रमें जम जाते हैं। नक़शा सामने न होने पर भी, सारा नक़शा उनको अपने नेत्रोंके सामने दीखने लगता है। उसी तरह मूर्त्तिपर ध्यान जमाने वालोंका, पीछे, अभ्याससे बिना मूर्त्ति, ध्यान जमने लगता है। मूर्त्ति में भगवान् नहीं हैं, मूर्त्ति खाली ध्यान जमानेका साधन-मात्र है। जो मूर्त्ति को ही भगवान् मान लेते हैं, वे अज्ञानी हैं।
जो लोग कहा करते हैं कि, मूर्त्तिपूजा से ईश्वर नहीं मिलता उन्हें महाकवियों के निम्नलिखित वाक्यों पर ध्यान देना चाहिये :—
( १ )
आखिर को इश्वके कुक से ईमान हो गया ।
मैं बुत-परस्तियों से सुसन्मान हो गया ॥१॥
मैं मूर्त्तिपूजा करते-करते ईश्वर-भक्त हो गया । प्रतीक के द्वारा ही मुझे ईशप्रप्ति हुई । मुझे अस्तंत से सत्तकी प्राप्ति हुई ।