वैराग्य शतक
Vairagya Shatak
भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा
स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५२४ )
काबे जाना भी तो बुतखानेसे होकर आहिद ।
दूर इस राह से अल्लाह का घर कुछ भी नहीं ॥ २ ॥
भक्त महाशय ! अगर काबे जाना हो तो जाओ ; पर मन्दिर में हो कर भी एक राह उधरको जाती है। सब तो यह है, कि उस मार्गसे अल्लाहका घर कुछ भी दूर नहीं है। मूल्चिपूजा से भी ईश-प्राप्ति अनायास हो जाती है।
तेरी सूरत को देखता हूँ मैं ।
उसकी सूरत को देखता हूँ मैं ॥३॥
तेरी सूरतमें मुझे ईश्वर की माया दीखती है। तेरा चेहरा उसको स्ष्टि का बढिया नमूना है।
तेरी खूबसूरती को देखकर मेरा दिल कठेजसे निकला पड़ता है, तो तेरा गढ़ने वाला तो तुम्हें से भी बढ़कर होगा ; अतः मैं तुझे छोड़, उस से ही प्रेम क्यों न करूँ ? बहुत से लोग ईश्वरकी कुदरतके नमूने या प्राकृतिक शोभा देख-देख कर सच्चे ईश्वर-भक्त बन गये हैं।
( २ )
( ६४ ) ईश्वर सर्व व्यापक कहलाता है, पर वह दीखता क्यों नहीं ? उसे कैसे देख सकते हैं ?
उ०—हाँ, ईश्वर सर्वत्र है। जमीन, आस्मान, सूरज, चाँद, समुद्र, नदी, पशु, पक्षी और मनुष्य सबमें ईश्वर है। उसे देखने के लिये उत्तुङ्ग रहो, उसके प्रेममें डूब जाओ, वह दीखेगा। पर