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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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यह भी याद रखो, कि वह इन चमड़ेकी आँखोंसे नहीं दूखता, वह ज्ञान की आँखों से दीखता है।

महा कवि दाग कहते हैं :—

यहाँ भी तू वहाँ भी तू जूसी तेरी फलक तेरा । कहीं हमने पतापाया न हरगिज आजतक तेरा ॥

यहाँ भी तू है और वहाँ भी तू है। ये जमीन आस्मान सब तेरे ही हैं। फिर भी तेरा पता नहीं मिलता। कहीं तेरी सर्वव्यापकता ही तो तेरे गुप्त होनेका कारण नहीं ?

रहिए सुरताक जलव-ये दीदार । हमने माना नजर नहीं आता ॥

रसके दर्शनोंके लिये इच्छुक रहनेकी आवश्यकता है। यह दूसरी बात है कि, वह दिखाई न दे।

देख गर देखना है जौं कि वह परदानशी । दीदये रोजने दिलसे है दिखाई देता ॥

अगर तू उस पर्दानशीन यार को सम्मुख ही देखना चाहता है, तो उसे मानस चक्षुओं से देखने की कोशिश कर, क्योंकि चर्मचक्षुओं से वह नहीं दीखता।

कृष्ण भगवान् स्वयं गीतामें कहते हैं :—

“विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषां” मूढ़ लोग ईश्वर को नहीं देख सकते। सिर्फ वही देख सकते हैं, जिनके