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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५२६ )

ज्ञानके नेत्र हैं ; यानी ईश्वर ज्ञानकी आँखों से दीखता है, चमड़ेको आँखोंसे नहीं दीखता ।

कहाकबि गालिब कहते हैं :—

असले शहद शाहिदो मशहद एक हैं ।

हैरों हूँ फिर मुशाहिदा है किस हिसाब में ॥

जब देखने वाला, दृश्य और दर्शक एक ही हैं । जब सब में एक ईश्वर है ; तब फिर किसका दर्शन किया जाय ? सारे संसार में ब्रह्म व्यापक है और वह मैं ही हूँ, "सोऽहं भाव" दिखाया है ।

और भी—

कतरेमें दजला दिखाई न दे और जुजब में कुल ।

खेल लडकोंका हुआ दीदये बीना न हुआ ॥

वूँ दमें जिसने समुद्रको न देखा और व्यष्टिमें सप्तष्टि को-तो वह ज्ञान-वशु ही क्या हुए ? आत्मसाक्षात्कार कोई लड़कों का खेल थोड़े ही है । इसमें शुद्ध अद्भुतवाद है ; यानी जीव ब्रह्म सब एक ही हैं और एक ब्रह्म के लिवा दूसरा और कोई नहीं है ।

उस्ताद जौक कहते हैं :—

दाना खिरमन है हमें, कतरा है दरिया हमको ।

आये हैं जुजमें नजर कुलका तमाशा हमको ॥