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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५२७ )

हम दाने में डेर और बूँदमें समुद्र देखते हैं। हम व्यष्टि में समष्टि का तपाशा देखने वाले हैं ; तङ्ग-नञ्जर नहीं हैं।

महाकवि ज़ौक कहते हैं—

वह पहलूमें बैठे हैं और वद-गुमानी ।

लिये फिरती सुस्को कहीं-का-कहीं है ॥

वह ईश्वर पहलू-बगल में बैठा है ; पर अम-वश में उसे जहाँ-तहाँ खोजता फिरता हूँ ।

जहाँके आईनेसे दिलका आईना है जुदा ।

उस आईनेमें हम आईनेगरको देखते हैं ॥

संसारके दर्पणसे दिल का दर्पण अलग है। दिलके दर्पणमें हम दर्पण बनाने वाले—ईश्वरको देखते हैं।

( ६५ ) ईश्वरको सेवा से क्या फल मिलता है ?

महाकवि गालिब कहते हैं :—

तेरी बन्दानवाज़ी हफ़त क़िश्वर बख़ूफ़ा देती है ।

जो तू मेरा जहाँ मेरा अरब मेरा अजम मेरा ॥

तेरी सेवा निष्कल नहीं जाती। तेरी सेवा करनेसे सातों विद्यायतका राज्य मिल जाता है। अगर तू मेरा हो ढ़ाय, तो संसार मेरा, अरब मेरा और अजम मेरा।

मनुष्यकी सेवामें कुछ लाभ नहीं ; लाभ है जगदीश की सेवा में ; उसकी कृपा होनेसे फिर कोई अभाव नहीं रहता।

( ६६ ) ईश्वर कैसा है ?