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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५२८ )

३०—महाकवि दागा कहते हैं :—

सिफातो जातमें यकता है तू ऐ वाहिदे मुतलक़ ।

न कोई तेरा सानी है न कोई मुश्तरक तेरा ॥

हे त्रिविध भेद-शून्य परमात्मा ! तू अद्वितीय है, तेरा, जोड़ा नहीं है और कोई तेरा शरीर या साक्षी भी नहीं है ।

( ६७ ) मनुष्य देवताओं से कब बढ़ सकता है ?

३०—अगर मनुष्य किसी भी चीज़की इच्छा न रखे, उसमें मोह-ममता और वासना न हो ; तो वह देवताओं से भी बढ़कर हो है ।

उस्ताद ज़ौक कहते हैं :—

जिस इन्हीं को सगे दुनिया न पाया ।

फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ॥

जो मनुष्य संसार का कुत्ता नहीं-संसार का दास नहीं, वह देवताओंसे बढ़ कर है ।

हमारे यहां भी शुक्रदेवजी ने कहा है :—

इन्द्रोऽपि न सुखी तादृश्यादृमिन्मुखु निःस्पृहः ।

लोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकी विभवे सति ॥

निस्पृह-इच्छारहित भिक्षु जैसा सुखी है ; वैसा सुखी इन्द्र भी नहीं । जब त्रिलोकिका विभव होने पर भी, निःस्पृह भिल्लारीके समान इन्द्र सुखी नहीं है, तब और कौन हो सकता