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वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

( ५२८ )

३०—महाकवि दागा कहते हैं :—

सिफातो जातमें यकता है तू ऐ वाहिदे मुतलक़ ।

न कोई तेरा सानी है न कोई मुश्तरक तेरा ॥

हे त्रिविध भेद-शून्य परमात्मा ! तू अद्वितीय है, तेरा, जोड़ा नहीं है और कोई तेरा शरीर या साक्षी भी नहीं है ।

( ६७ ) मनुष्य देवताओं से कब बढ़ सकता है ?

३०—अगर मनुष्य किसी भी चीज़की इच्छा न रखे, उसमें मोह-ममता और वासना न हो ; तो वह देवताओं से भी बढ़कर हो है ।

उस्ताद ज़ौक कहते हैं :—

जिस इन्हीं को सगे दुनिया न पाया ।

फरिश्ता उसका हमपाया न पाया ॥

जो मनुष्य संसार का कुत्ता नहीं-संसार का दास नहीं, वह देवताओंसे बढ़ कर है ।

हमारे यहां भी शुक्रदेवजी ने कहा है :—

इन्द्रोऽपि न सुखी तादृश्यादृमिन्मुखु निःस्पृहः ।

लोऽन्यः स्यादिह संसारे त्रिलोकी विभवे सति ॥

निस्पृह-इच्छारहित भिक्षु जैसा सुखी है ; वैसा सुखी इन्द्र भी नहीं । जब त्रिलोकिका विभव होने पर भी, निःस्पृह भिल्लारीके समान इन्द्र सुखी नहीं है, तब और कौन हो सकता

( १०० )

है। उपन्यास तो आपने बहुतेरे देखे होंगे ; लेकिन हम दावेके साथ कहते हैं, कि ऐसा एक भी उपन्यास आपने देखा न होगा। इसकी भाषा इतनी आसान है, कि बच्चे भी आसानीसे समझ सकते हैं। आदमी के साही गुमगीन क्यों न हो ; कोई कितना ही गम्भीर क्यों न हो ; इस उपन्यास की दो-चार सतरें पढ़ते ही सारी गुमगीनी और गम्भीरता भाग जाती है। मुहर्दमी सूरत भी मारे हँसके लोटन-कबूतर हो जाती है। इस उपन्यासका विषय बड़ा ही रोचक और शिक्षाप्रद है। थोड़ा पढ़ते ही आँखों और छातीसे विमट जाता है। जबतक यह उपन्यास समाप्त नहीं होता, तबतक अपने पढ़नेवालोंका खाना, पीना और सोना भुलाये रहता है।

भारत की लाटगीरी करनेसे पहले लार्ड कर्जनेने इसे सम्पादित कर यूरोपमें बड़ा नाम पाया था। इसकी खूबसूरती आपके मकान की शोभा बढ़ाने लायक है। सब मिलाकर, इसमें चौबीस हाफटोन तस्वीरें दी गई हैं। हर तस्वीर ऐसी है, कि देखिये तो देखते ही रहिये। मोटे कागज़ पर बड़े ही साफ अक्षरोंमें पुस्तक छापी गयी है। रेशमी चमचमाती जिल्द है। लेकिन पृष्ठके इस मोटे उपन्यासका दाम सिर्फ साढ़े तीन रुपये। के जिल्दके तीन रुपये। डाक-महसूल दस आने।

पता—हरिदास एगड़ कम्पनी,

२०१, हरिसन रोड, कलकत्ता।

( १ )

ऐसा था बाँसुरीके बजैयाका बालपन । क्या-क्या कई मैं कृष्ण कन्हैयाका बालपन ॥२॥

आपने प्रेम-सम्बन्धी पुटककर शोरोंके सिवा “पेट,” “मनुष्य” “बचपन,” “बुढ़ापा,” “रोटी,” “संसार मिथ्या” बजारा नामा प्रभृति पर भी बड़ी ही मनोहर कवितायें लिखी हैं। आपकी ब्रह्मानन्द-सम्बन्धी कविता इसी पुस्तकके अन्तमें देखें। इस पुस्तकके प्रकाशित होनेके पहले शौक्रान आपकी कविताओं को तरसते थे। जब से यह पुस्तक छपी है, घड़ा-घड़ बिक रहो है। आप इसे अवश्य देखें। दाम १)

श्रियायत ।

जो सज्जन दाग, जोड़, गालिब और नज़ीर-चारों पुस्तके एक साथ माँगायेंगे, उन्हें ३) देने होंगे। डाकमहसूल १ पार्श्व न देना होगा।

उपन्यास-सम्राट्

हाजीबाबा ।

सम्पादक

भूतपूर्व वाइसराय लार्ड कर्जन महोदय ।

पृष्ठ-संख्या ३५०

चित्र-संख्या २४

यह रहस्य-पूर्ण उपन्यास हाल ही में छप कर तैय्यार हुआ