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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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है। उपन्यास तो आपने बहुतेरे देखे होंगे ; लेकिन हम दावेके साथ कहते हैं, कि ऐसा एक भी उपन्यास आपने देखा न होगा। इसकी भाषा इतनी आसान है, कि बच्चे भी आसानीसे समझ सकते हैं। आदमी के साही गुमगीन क्यों न हो ; कोई कितना ही गम्भीर क्यों न हो ; इस उपन्यास की दो-चार सतरें पढ़ते ही सारी गुमगीनी और गम्भीरता भाग जाती है। मुहर्दमी सूरत भी मारे हँसके लोटन-कबूतर हो जाती है। इस उपन्यासका विषय बड़ा ही रोचक और शिक्षाप्रद है। थोड़ा पढ़ते ही आँखों और छातीसे विमट जाता है। जबतक यह उपन्यास समाप्त नहीं होता, तबतक अपने पढ़नेवालोंका खाना, पीना और सोना भुलाये रहता है।

भारत की लाटगीरी करनेसे पहले लार्ड कर्जनेने इसे सम्पादित कर यूरोपमें बड़ा नाम पाया था। इसकी खूबसूरती आपके मकान की शोभा बढ़ाने लायक है। सब मिलाकर, इसमें चौबीस हाफटोन तस्वीरें दी गई हैं। हर तस्वीर ऐसी है, कि देखिये तो देखते ही रहिये। मोटे कागज़ पर बड़े ही साफ अक्षरोंमें पुस्तक छापी गयी है। रेशमी चमचमाती जिल्द है। लेकिन पृष्ठके इस मोटे उपन्यासका दाम सिर्फ साढ़े तीन रुपये। के जिल्दके तीन रुपये। डाक-महसूल दस आने।

पता—हरिदास एगड़ कम्पनी,

२०१, हरिसन रोड, कलकत्ता।