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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५२२ )

तात्पर्य यह है, जिनके अन्तःकरण मोह और ममतासे मैले हो गये हैं, उनको गृहस्थीके नाना प्रकारके दुःख देखकर भी गृहस्थीसे घृणा नहीं होती ; किन्तु जिनके अन्तःकरण सत्सङ्ग से शुद्ध हो जाते हैं, उनको गृहस्थीसे नफ़रत होने लगती है । उन्हें गृहस्थी जञ्जाल मालूम होती है । बाज़-बाज़ लोग बेगारमें पकड़े हुओंकी तरह गृहस्थीमें काम करते हैं और ज्योंही मौका पाते हैं त्योंही छोड़ भागते हैं ।

( ६२ ) प्र०—गृहस्थीमें भी किले विशेष नहीं होता ?

उ०—जिसमें ममता नहीं, उसे विशेष क्यों होने लगा ? जो ममता त्यागकर गृहस्थीके काम करता है, उसे विशेष नहीं होता । जिले संसारी विषय-भोगोंमें ममता नहीं, वह घरमें रहता हुआ भी सुखी है । जिसमें ममता है, वह गृहत्यागी भी दुःखी है ।

( ६३ ) प्र०—मनके निरोधके साधन क्या हैं ?

उ०—वैराग्य और अभ्यास । मनुष्य या देवताकी मूर्ति या सूरज चन्द्रमा प्रभृति जो अपनेको प्यारे लगते हों, उनमें मनको लगाकर मनका निरोध करना चाहिए । पहले मनको स्थूल पदार्थोंमें लगाना चाहिए । जब मन स्थूलमें लगने लगता है, तब धीरे-धीरे अभ्यासले सूक्ष्ममें जाकर उहर जाता है । बिना स्थूल पदार्थोंमें लगे, सूक्ष्ममें मन लग नहीं सकता । बिना मनके एक जगह उहर, परमात्मन् मिल ही नहीं सकता । मतलब यह है, मन के रोकने या उहरानेमें ही परम सुख है और

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