सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

Devanagarihipublished648 पृष्ठ

पृष्ठ 639, कुल 648 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 639

( ५२१ )

पर, गुदेा द्वारा खून गिरनेका भ्रम हो गया था ; उसी तरह जीवको अपने स्वरूपमें भ्रम हो रहा है ।

( ६० ) प्र०—इस जीवको सुख कब मिलता है ?

उ०—जब यह जीव अहङ्कार और ममताको त्याग देता है । जबतक मनुष्यके मनमें “मैं और तू” का भगड़ा रहता है, जब तक उसकी ममता खी-पुत्र और घर-मकान आदिमें रहती है, तब तक उसे सुख नहीं होता ।

( ६१ ) प्रश्न—यह संसार असार और महा मलिन है ; फिर लोग इसकी मोह-ममतामें क्यों फँसे हैं ? इसे त्यागते क्यों नहीं ?

उ०—जो लोग मोह-ममतामें फँसे हैं, उन्हें मलिन वस्तुओंसे भी घृणा नहीं होती । जिस तरह भङ्गीको मैलेके देखने या उठानेसे नफ़रत नहीं होती ; उसी तरह मोह-ममतामें फँसे हुए गृहस्थोंको ऐसे गृहस्थभ्रमसे भी घृणा नहीं होती, जो महागन्द्गीका स्थान और दुःख-शोकका भण्डार है । कहीं गृ पड़ा है, कहीं वमन पड़ी है, कहीं रहट पड़ा है, कहीं शूक और खलार पड़ा है, कहीं कोई रोता है, और कहीं कोई हाय-हाय करता है । वजह यह है कि, उनका खभाव ही भङ्गीकी तरह वैसा ही हो जाता है । उनका दिमाग गन्दा हो जाता है । घर-गृहस्थीकी मलिनता और गन्द्गी प्रभृति उनके दिमागमें समा जाती है । कृसाईखानेकी दुर्गन्ध कृसाईयों के दिमागमें समा जाती है । मोचीखानेकी बदबू मोचियोंके भीयमें समा जाती है ।