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भारतकोश
वैराग्य शतक

वैराग्य शतक

Vairagya Shatak

भर्तृहरि (टीकाकार: हरिदास वैद्य) द्वारा

स्रोत: 1925 Haridas Vaidya edition · Haridas And Co., Kolkata / Digital Library of India · 1925 (उद्गम)

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( ५२० )

राज्य-सुख और लोपुशदि मिलें', तो उसे मरकर जन्म लेना होगा और वह इच्छित फल उसे भोगने होंगे। लेकिन जो, बिना किसी कामनाको मनमें रखे, ईश्वर-भजन करेगा, उसे फल भोगनेको जन्म न लेना होगा ; यानी उसकी मोक्ष हो जायगी।

( ५८ ) प्र०—जीव डरता क्यों है ?

उ०—जीव अज्ञानसे डरता है। वास्तवमें उसे किसीका भय नहीं। जब मन किसी दूसरेकी कल्पना करता है, तभी उसे भय लगता है। असलमें, एक अपने आत्माके सिवा दूसरा कोई है ही नहीं, फिर डर और भय किसका ? असलमें सब आफूतोंकी जड़ यह मन है। वास्तवमें न बन्धन है न मोक्ष। बन्धन और मोक्ष मनके सङ्कल्प मात्र हैं। मनके शान्त होनेपर वे शान्त हो जाते हैं। जिस तरह बच्चा अपनी ही परछाहीं से डरता है ; उसी तरह यह जीव अपने संकल्पोंसे डरता है।

( ५९ ) प्र०—क्या आत्मा सचमुच अजर और अमर है ?

उ०—बेशक ; आत्मा अनादि, अजर और अमर है। यह जीव अज्ञानके कारण अपने अजर अमर आत्मामें जन्म और मरण आदि मानता है। जब इसे किसी सत्पुरुषका उपदेश मिलता है, तब इसे होश होता है। उस समय यह अपने तर्ज अजर और अमर समझकर, जन्म-मरणसे रहित हो जाता है। जिस तरह एक बनियेको, गेह-घुले लोटेके जलसे आबद्धस्त लेने